बीजेपी ऐसे चुनाव लड़ती है...सांसद, मंत्री और विधायक बन जाते है आम कार्यकर्ता

कांग्रेस-मुस्लिम लीग माओवादी पार्टी : पीएम मोदी
बीजेपी मुख्यालय में बोले पीएम मोदी- बिहार के लोगों ने गरदा उड़ा दिया, हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं का अभिनंदन, आभार
रायपुर/दिल्ली/बिहार। बिहार में गमछे की धूम... प्रधानमंत्री ने चुनाव के दौरान भी गमछा लहराया था, और विजय जुलूस में गमछा लहराकर बिहार की जनता और कार्यकर्ताओं का अभिवादन किया... और बिहार से गंगा बंगाल की ओर बहती है की बात कर बंगाल के लिए चुनौती और चेतावनी भी दी... अब भारतीय जनता पार्टी के लिए एक मात्र उद्देश्य पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाना है...
बीजेपी के 40 स्टार प्रचारकों की कड़ी मेहनत का नतीजा, जीत...जीत...जीत...
नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री)
अमित शाह (गृह मंत्री)
जे.पी. नड्डा (बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष)
राजनाथ सिंह (रक्षा मंत्री)
नितिन गडकरी
शिवराज सिंह चौहान (मध्य प्रदेश के पूर्व / वर्तमान मुख्यमंत्री)
धर्मेंद्र प्रधान
गिरिराज सिंह
योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री)
देवेंद्र फडणवीस (महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री)
हिमंता बिस्वा सरमा (असम के मुख्यमंत्री)
मोहन यादव (मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री)
रेखा गुप्ता (दिल्ली की मुख्यमंत्री)
स्मृति ईरानी
केशव प्रसाद मौर्य
सी.आर. पाटिल
दिलीप कुमार जायसवाल
सम्राट चौधरी
विजय कुमार सिन्हा
रेणू देवी
प्रेम कुमार
नित्यानंद राय
राधा मोहन सिंह
साध्वी निरंजन ज्योति
सतीश चंद्र दुबे
राज भूषण चौधरी
अश्विनी कुमार चौबे
रवि शंकर प्रसाद
नंद किशोर यादव
राजीव प्रताप रूडी
संजय जयसवाल
विनोद तावड़े
बाबुलाल मरांडी
प्रदीप कुमार सिंह
गोपालजी ठाकुर
जनक राम
पवन सिंह (भोजपुरी अभिनेता-गायक)
मनोज तिवारी (भोजपुरी अभिनेता / नेता)
रवि किशन (भोजपुरी अभिनेता)
दिनेश लाल यादव निरहुआ (भोजपुरी स्टार)
बड़े नेताओं ने दिन-रात की मेहनत और लगन से मिली बड़ी जीत
अमित शाह — 36 सभाएं / रोड शो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी — करीब 14 सभाएं
योगी आदित्यनाथ — 31 सभाएं / रैलियां।
मध्य प्रदेश के CM मोहन यादव — 917 सभाएं।
राजनाथ सिंह — 21 सभाएं।
जेपी नड्डा — 15 सभाएं।
नितिन गडकरी — 7 सभाएं।
देवेंद्र फडणवीस — 12 सभाएं।
रेखा गुप्ता — 18 सभाएं।
हिमंता बिस्वा सरमा — 10 सभाएं।
पवन सिंह — 41 सभाएं।
मनोज तिवारी — 37 सभाएं।
कांग्रेस अब मुस्लिम लीग और माओवादी कांग्रेस बन गई है , कांग्रेस का एक और विभाजन हो सकता है , कांग्रेस के सहयोगी कांग्रेस से सावधान रहें ,कांग्रेस लायबिलिटी, आज क्रछ्वष्ठ को साँप सूंघा हुआ है , बहुत जल्द क्रछ्वष्ठ-कांग्रेस का झगड़ा सामने आएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में हुए शांतिपूर्ण और रिकॉर्ड मतदान को लेकर शनिवार को एक महत्वपूर्ण संबोधन में कहा कि राज्य ने लोकतंत्र की मजबूती और परिपक्वता का ऐतिहासिक उदाहरण पेश किया है। उन्होंने कहा कि यह वही बिहार है, जहां कभी माओवादी हिंसा और नक्सली प्रभाव के कारण सुरक्षा स्थिति इतनी खराब रहती थी कि मतदान को दोपहर 3 बजे ही समाप्त करना पड़ता था। लेकिन इस बार जनता ने बिना किसी भय के, उत्साह और उमंग के साथ मतदान में हिस्सा लेकर जवाब दे दिया कि नया बिहार अब डर नहीं, लोकतंत्र की शक्ति से चलता है। बिहार के बाद अब बंगाल में भी जनादेश का झंडा फहराना होगा है। मोदी ने आगे कहा है कि बंगाल की जनता को आश्वस्त करता हूं कि बंगाल का स्वरूप भी बदल दूंगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि पहले के दौर में बिहार में चुनावों का मतलब अक्सर हिंसा, ड्ढशशह्लद्ध ष्ड्डश्चह्लह्वह्म्द्बठ्ठद्द और मतपेटियों की लूट से जुड़ा होता था। जंगलराज के दौरान क्या होता था, यह किसी से छिपा नहीं है। मतपेटियों को खुलेआम लूटा जाता था, मतदान केंद्रों पर आतंक और दबाव का माहौल बना दिया जाता था। लेकिन आज उसी बिहार में रिकॉर्ड वोटिंग हो रही है, लोग लोकतंत्र के पर्व में शांति और सम्मान के साथ भाग ले रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा।
उन्होंने बिहार के इतिहास की ओर इशारा करते हुए बताया कि कभी राज्य में पुनर्मतदान आम बात थी। प्रधानमंत्री ने कहा, 2005 से पहले ऐसा कोई चुनाव नहीं होता था, जिसमें सैकड़ों जगहों पर पुनर्मतदान न होता हो। 1995 में तो 1500 से ज्यादा मतदान केंद्रों पर ह्म्द्गश्चशद्यद्य होना पड़ा था। लेकिन जैसे-जैसे जंगलराज खत्म हुआ और सुशासन ने जगह ली, हालात बदलते गए। इस बार हुए दोनों चरणों के चुनाव में कहीं भी पुनर्मतदान की नौबत नहीं आई। यह लोकतांत्रिक सुधारों की सबसे बड़ी सफलता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने शांति, पारदर्शिता और सुचारु चुनाव प्रक्रिया के लिए राज्य प्रशासन, चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता ने भी चुनाव को सफल बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस बार मतदान शांतिपूर्ण रहा। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। यह वर्षों की मेहनत, राज्य में व्यवस्था सुधार, सुरक्षा तंत्र मजबूत करने और जनता की जागरूकता के कारण संभव हुआ है, उन्होंने कहा। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि बिहार ने दुनिया को एक बार फिर दिखा दिया है कि वह लोकतंत्र की जननी है। यह वही धरती है जिसने भारत को लोकतंत्र की जननी होने का गौरव दिया है। बिहार ने दिखा दिया कि झूठ और नकारात्मकता हारती है, जबकि जनविश्वास और विकास की राजनीति जीतती है, उन्होंने कहा। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता अब उन लोगों का साथ नहीं देगी जो ‘ज़मानत पर चल रहे’ हैं या जिनकी राजनीति सिर्फ भ्रम और झूठ फैलाने पर आधारित है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि बिहार की जनता ने यह दिखा दिया है कि लोकतंत्र तब और मजबूत होता है जब जनता विकास, सुशासन और स्थिरता को प्राथमिकता देती है। उन्होंने कहा कि यह परिणाम बिहार की राजनीतिक परिपक्वता और नई पीढ़ी की जागरूकता का प्रमाण है। आज का युवा बिहार के विकास के साथ खड़ा है। वह जानता है कि अतीत का जंगलराज बिहार को पीछे ले गया था, लेकिन आज किए जा रहे प्रयास राज्य को नई ऊंचाइयों की ओर ले जा रहे हैं, उन्होंने कहा। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि जनता ने विकास बनाम विघटन की राजनीति के बीच स्पष्ट तौर पर विकास को चुना है। यह चुनाव सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि जनता के मन की गहरी भावनाओं का प्रतिबिंब है। बिहार में बदलाव सिर्फ सडक़ों, पुलों, बिजली या योजनाओं में नहीं, बल्कि लोगों की सोच में दिखाई दे रहा है, उन्होंने कहा।
प्रधानमंत्री ने दावा किया कि बिहार के शांतिपूर्ण चुनाव ने देशभर में एक सकारात्मक संदेश दिया है कि लोकतंत्र विरोधी शक्तियों को जनता जवाब देना जानती है। यह नया बिहार है। यह आत्मविश्वासी है। यह जिम्मेदार है। और सबसे बड़ी बात, यह विकास और सुशासन के रास्ते पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ रहा है, उन्होंने कहा। अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री ने एक बार फिर बिहार की जनता को बधाई देते हुए कहा कि यह जनादेश लोकतांत्रिक मूल्यों और विकास की राजनीति की जीत है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले दिनों में बिहार देश की प्रगति में और अधिक मजबूत योगदान देगा।
छत्तीसगढ़ के भी सभी नेताओं ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया
25 अक्टूबर को बक्सर के एक होटल में मैं अपनी टीम के साथ डिनर कर रहा था । दूसरी टेबल पर बीजेपी का फटका डाले कुछ नेता टाइप के लोग बैठे थे । उनमें से एक सज्जन बार -बार मेरी तरफ़ देख रहे थे । मैं भी उन्हें पहचानने की कोशिश कर रहा था । तभी वो मेरे पास आए और बोले - मैं सतीश गौतम , अलीगढ़ से बीजेपी का सांसद हूं । मैंने पूछा - आप यहां ? उन्होंने कहा - मैं एक महीने से बक्सर में हूं । इस बार हम बक्सर जीतेंगे। संक्षिप्त बातचीत के बाद वो अपनी सीट पर चले गए ।
मैं सोचने लगा कि बीजेपी कैसे चुनाव लड़ती है , इसका नमूना ये है कि अलीगढ़ का एक सांसद कई लोगों के साथ बक्सर में कैंप करके बैठा है । ज़ाहिर है और भी बहुत से लोग होंगे। बक्सर आखऱि जीत ही गई बीजेपी ।
अगले दिन वहां से आरा होते हुए पटना लौट रहा था तो सडक़ के किनारे झुग्गी बस्तियों मे कुछ लोग बीजेपी के पर्चे बांटते दिखे। तभी मेरी नजऱ यूपी बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह पर पड़ी । मैंने थोड़ा आगे जाकर गाड़ी रोकी और पलटकर देखने गया कि वाक़ई स्वतंत्र देव ही हैं कि कोई और है ।।पता चला कि स्वतंत्र देव कुछ लोगों के साथ सडक़ के किनारे दुकानदारों और बस्ती वालों से बात करते चल रहे थे। जरा सोचिए । यूपी के एक बड़ा नेता सडक़ के किनारे कुछ कार्यकर्ताओं के साथ धूल फांकता हुआ प्रचार कर रहा था। कोई कैमरा नहीं । कोई पब्लिसिटी नहीं । कोई रील नहीं ।
पहले दौर के चुनाव के बाद मैं किशनगंज के दफ्तरी पैलेस होटल के बाहर गाड़ी से सामान निकाल रहा था , तभी एक सज्जन आकर मिले । सूरत के कारोबारी के रुप में अपना परिचय दिया और कहा कि मैं कुछ दिनों तक तेघरा में तैनात था । वहां हम लोगों ने रजनीश कुमार की जीत के लिए दिन -रात काम किया है। गुजराती सज्जन ने पूरा हिसाब किताब समझाया कि कैसे रजनीश कुमार को 110000 से ज्यादा वोट मिलेंगे और काफी मार्जिन से जीतेंगे । उन्होंने अपना नंबर दिया और दावा किया कि नतीजों के दिन आप चाहें तो फ़ोन कर लीजिएगा । अभी देख रहा हूं कि रजनीश कुमार 112000 वोट पाकर 35 हज़ार वोट से जीत गए हैं। सीपीआई के मौजूदा विधायक चुनाव हार गए हैं ।
उन्होंने कहा कि अब हम किशनगंज जिले में काम करने आ गए हैं । उन्होंने बड़े उत्साह के साथ ये भी बताया कि कैसे गुजरात के बहुत से लोग अलग- अलग इलाकों में आकर महीने भर से डटे हैं । ऐसे न जाने कितने लोग बीजेपी के लिए महीने -दो महीने से बिहार में काम कर रहे थे । दर्जन भर मुख्यमंत्री, दर्जनों कैबिनेट मंत्री , दो सौ से ज्यादा सांसद और अलग अलग राज्यों से आए हजारों लोग बिहार में डटे थे ।
बिहार में एनडीए की जीत की व्याख्या करते वक्त इसे भी समझना होगा कि बीजेपी चुनाव लड़ती कैसे है ?
बीजेपी ऐसे दधीचि कार्यकर्ता पैदा करती है, जो अपने हाड़ गला कर, दिन-रात मेहनत कर काम करते हैं और श्रेय लेने के वक्त सबसे पीछे खड़े रहते हैं, बिहार चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ऐसे ही कार्यकर्ता हैं, पूरे बिहार चुनाव अभियान में उन्होंने कठिन परिस्थितियों में गठबंधन, सीट साझेदारी के क्लिष्ट विषय बेहद शांत और सहज अंदाज़ में सुलझाये, कैमरे की चमक-दमक से दूर हर विधानसभा में दौरे किए, वे बागी नेताओं, गठबंधन के टकराव, उम्मीदवारों की ज़रूरतों के हल निकालते रहे, लेकिन आज प्रचंड जीत के दिन श्रेय और सुर्खियों से गायब हैं, ऐसे ही बीजेपी हर चुनाव नहीं जीतती है उसके पास धर्मेंद्र प्रधान जैसे सर्वस्व न्यौछावर कर पार्टी की जीत के सपने को सच करने के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता हैं,
रूक्क के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा अपनी विधायकी हार गए, उन्हें अब तक भी कोई पद नहीं दिया गया है लेकिन बिहार में वो डटे हुए थें, पार्टी ने उन्हें बिहार भेजा और काम लिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, बृजमोहन अग्रवाल सहित प्रदेश के प्रमुख नेताओं ने बिहार में अपनी कर्तव्य और जिम्मेदारी का बखूबी पालन कर कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया और मार्गदर्शन दिया।
धमेंद्र प्रधान का योगदान भुलाया नहीं जाएगा
भाजपा के बिहार चुनाव प्रभारी रहे धर्मेंद्र प्रधान। बिहार से उनका पुराना रिश्ता रहा है। 2010 में उनके प्रभारी रहते भाजपा-जदयू ने रेकॉर्ड 206 सीटें जीतीं थीं। इसका उन्हें ईनाम भी मिला। पार्टी ने 2012 में बिहार से ही राज्यसभा भेजा। यही से उनकी जड़ें इस राज्य की राजनीति और संगठन में मजबूत होती चली गईं। बिहार में जहां पार्टी कमजोर रही, वहां संगठन को खड़ा किया, पार्टी की पकड़ मज़बूत होती गई। प्रधान को कहां भी जिम्मेदारी दी गई वहीं भारतीय जनता पार्टी को शत प्रतिशत सफलता मिली।
ओबीसी की उसी कुर्मी जाति से धर्मेंद्र प्रधान आते हैं, जिससे नीतीश कुमार हैं। नीतीश से अच्छी पटती है। प्रधान की सामाजिक पृष्ठभूमि ने भाजपा-जदयू के तालमेल को और मजबूत बनाया। इस बार भाजपा ने इसी पुराने तालमेल को देखते हुए प्रधान को चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा। यही वजह रही कि जदयू से बहुत जल्द बिना किसी खटपट के सीटों का बंटवारा हुआ और टिकट भी समय से पहले जारी हो गए। उनकी सामाजिक जुड़ाव और संगठनात्मक समझ ने एनडीए की जातीय-सामाजिक पहुंच को और व्यापक किया, जिसका सीधा लाभ चुनावी मैदान और नतीजों में दिखा।
धर्मेंद्र प्रधान का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड शानदार है। 2024 में बतौर प्रभारी हरियाणा या फिर 2022 में यूपी और 2017 की उत्तराखंड की जीत। गृह राज्य ओडिशा की जीत के भी शिल्पकार रहे। 2021 के बंगाल चुनाव में उस नंदीग्राम सीट पर प्रधान ही भाजपा के इंचार्ज थे, जहां से मुख्यमंत्री रहते ममता बनर्जी चुनाव हार गईं।
वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री होने के बाद भी प्रधान, लो प्रोफाइल रहते हैं। खामोशी के साथ कार्य करते हैं, लेकिन नतीजे शोर मचाते हैं। चुनाव के टाइम बहुत कम मीडिया से बात करते हैं। भाजपा के ऐसे नेता हैं, जो सबसे कम मीडिया इंटरव्यू देते हैं। उनकी प्राथमिकता हमेशा स्थानीय नेताओं से सीधे संवाद, बूथ-स्तर की संरचना को मजबूत करना और हर सीट के माइक्रो-मैनेजमेंट की रहती है। यकीनन साल भर के अंदर हरियाणा और बिहार की जीत पार्टी की झोली में डालकर उन्होंने बड़ी लकीर खींची है। नतीजों से प्रधान का क़द पार्टी में बढ़ा है। मेहनत-ईमानदारी और लगन के कारण निरंतर बढ़ता ही रहेगा।





