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शिमला। हिमाचल सरकार ने अनुबंध के सेवालाभ देने से रोकने के लिए लाए गए कर्मचारी एक्ट को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है। शिक्षा विभाग के निदेशक को इस बारे में एसएलपी का ड्राफ्ट महाधिवक्ता से क्लीयर करवाकर सुप्रीम कोर्ट में दायर करने को कहा गया है। हाईकोर्ट ने 2024 में लाए कर्मचारी एक्ट को 26 अप्रैल 2026 को रद्द कर दिया था। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने करीब 450 याचिकाओं का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि अगले तीन माह के भीतर पात्र कर्मचारियों को अदालती फैसलों के अनुरूप सभी अनुबंध सेवालाभ सुनिश्चित करे। अदालत ने कहा था कि सामान्य तौर पर न्यायपालिका पूरे कानून को रद्द करने से बचती है, लेकिन इस एक्ट की धारा 3, 5, 6, 7, 8 और 9 सीधे तौर पर संविधान के खिलाफ थी। इन धाराओं को हटाने के बाद कानून में कुछ भी बाकी नहीं बचता, इसलिए पूरे अधिनियम को ही असंवैधानिक घोषित कर किया गया है।
इस अधिनियम के आधार पर की गई सभी कार्रवाई, लाभों की कटौती या रिकवरी के आदेश भी अदालत ने रद्द कर दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया था कि राज्य विधानसभा को ऐसे कानून बनाने का अधिकार नहीं है, जो न्यायपालिका के आदेशों को पूरी तरह से समाप्त कर दे। अदालत ने इसे शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत और कानून के शासन का उल्लंघन माना था। अदालत ने कहा था कि यह अधिनियम भेदभावपूर्ण था, क्योंकि यह 12 दिसंबर 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को लाभ से वंचित कर रहा था, जबकि उससे पहले नियुक्त कर्मचारियों को समान लाभ दिए जा रहे थे। कोर्ट ने दोहराया कि जो कर्मचारी आरएंडपी नियमों के तहत पारदर्शी चयन प्रक्रिया से नियुक्त हुए हैं, वे नियमितीकरण के बाद अपनी पिछली अनुबंध सेवा के आधार पर वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभों के हकदार हैं। इस विवाद का मुख्य केंद्र ताज मोहम्मद और लेख राम बनाम हिमाचल मामले थे। सरकार ने हजारों करोड़ की देनदारी से बचने के लिए यह नया कानून बनाया था।
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