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Shimla. शिमला। केंद्र के प्रस्तावित वीबी-जीराम-जी कानून में किए वित्तीय प्रावधानों को लेकर प्रदेश के ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने बड़ी चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि वर्तमान रोजगार स्तर के आधार पर हिमाचल प्रदेश की अनुमानित वित्तीय देनदारी 164.63 करोड़ रुपए हो जाएगी। यदि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित वार्षिक आबंटन वास्तविक मांग से कम रहा, तो अतिरिक्त व्यय पूरी तरह राज्य सरकार को उठाना पड़ेगा। इससे प्रदेश पर हर वर्ष भारी वित्तीय बोझ पडऩे की आशंका है। अनिरुद्ध सिंह गुरुवार को शिमला में आयोजित प्रेस वार्ता को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन अधिनियम, 2025 मनरेगा की मूल भावना के विपरीत है।
ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि वर्तमान में केन्द्र सरकार द्वारा गैर जनजातीय क्षेत्रों के लिए 247 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी निर्धारित की गई है। वर्तमान व्यवस्था में मजदूरी का 100 प्रतिशत व्यय केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है, जबकि प्रस्तावित अधिनियम के तहत मजदूरी व्यय में राज्य सरकारों को भी 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी देनी होगी। प्रशासनिक व्यय, कर्मचारियों के वेतन तथा अन्य संचालन संबंधी खर्चों में भी राज्यों का योगदान बढ़ाया गया है, जिससे राज्यों की वित्तीय जिम्मेदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक हो जाएगी। अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि आरडीजी बंद किए जाने से हिमाचल प्रदेश को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि जब प्रदेश में भाजपा सरकार सत्ता में थी, तब केंद्र द्वारा प्रदेश को लगभग 47,000 करोड़ रुपए आरडीजी प्राप्त हुई थी, जबकि वर्तमान में अब तक केवल लगभग 11,000 करोड़ रुपए आरडीजी प्राप्त हुई। केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2026 में आरडीजी बंद कर दी जाएगी, जिस कारण प्रदेश सरकार पर 800 करोड़ से 1,000 करोड़ तक का वार्षिक अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।
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