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द्रविड़ राजनीति की हार सनातन की जीत है...

Nil dhankar
15 May 2026 8:13 AM IST
द्रविड़ राजनीति की हार सनातन की जीत है...
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डॉ. अनिल द्विवेदी

जिस तमिलनाडु विधानसभा में सनातन को नष्ट करने की बात कही गयी, उसी विधानसभा में अध्यक्ष ने बाइबिल सुना सत्र की शुरुआत की। विश्व की प्राचीनतम संस्कृति को समाप्त करने का आव्हान और एक विदेशी संस्कृति का गुणगान, क्या यही है भारत का वन-वे सेकुलरिज्म?

गुजरे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी विजेता बनकर उभरी है। भाजपा ने बड़ा इतिहास पश्चिम बंगाल को जीतकर रचा है जहां संघ परिवार 70 सालों से सत्ता में नही आ सका था। इस जीत का आधार भाजपा कार्यकर्ता और संघ के स्वयंसेवकों का संघर्ष और बलिदान तो है ही, आरएसएस की सालों की तपस्या, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का नेतृत्व तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी की अचूक रणनीति का कमाल भी है। मात्र दस सालों में ही भाजपा पश्चिम बंगाल में तीन सीट से 207 सीटों तक पहुंची और आज वह राज्य की सरकार में है।

तमिलनाडु की राजनीति भारत के सबसे अनोखे राजनीतिक इतिहासों में गिनी जाती है। इसकी शुरुआत गैर-ब्राह्मण आंदोलन और जस्टिस पार्टी से हुई, जिसने सामाजिक न्याय और आरक्षण की नींव रखी। बाद में पेरियार के द्रविड़ आंदोलन, डीएमके के उदय, हिंदी विरोधी आंदोलन और एआईएडीएमके के गठन ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी। करुणानिधि और जयललिता के दशकों लंबे सत्ता संघर्ष ने तमिलनाडु को द्विध्रुवीय राजनीति का केंद्र बना दिया। अब थलापति विजय की टीवीके पार्टी नई राजनीतिक चुनौती बनकर उभरी है, जिससे राज्य की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है।

भाजपा का अगला लक्ष्य तमिलनाडु और केरल हो सकता है। तमिलनाडु में अन्नामलाई भाजपा के लिए सबसे जाने माने चेहरे थे। वे आइपीएस जैसा बड़ा कैरियर छोड़कर भाजपा में आए और पार्टी की कमान संभाल ली। गुजरे विधानसभा चुनाव में भाजपा ने वहां चार सीटें जीती थीं लेकिन हाल ही में हुए चुनाव में पार्टी एक सीट पर सीमित हो गई। वोट प्रतिशत 11 से घटकर महज 2 प्रतिशत बचा है। जिस पार्टी के लिए अन्नामलाई ने अपना चमकता हुआ कैरियर दांव पर लगा दिया, उसमें उनकी ऐसी अनदेखी? प्रतिफल तो मिलना ही था। भाजपा की रणनीति के आगे दिग्गज भी सोचने को मज़बूर होते रहे हैं पर यहाँ दाँव उल्टा पड़ गया। बीजेपी ने असम और बंगाल में शानदार जीत हासिल की। केरल में शून्य से तीन सीटों पर पहुंच गयी। पुदुचेरी में भी दोबारा सरकार बन गयी लेकिन तमिलनाडु में नए प्रयोग से भाजपा सस्ते में निपटी। नए प्रयोग और एआईडीएमके के दबाव में आकर अन्नामलाई को चुनाव अभियान से भी अलग कर दिया गया। कोयंबतूर जैसे बीजेपी की मजबूती वाले जिले की सभी सीट भी आसानी से एआईडीएमके को दे दी गईं। तमिलनाडु की आबादी में चार फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ब्राह्मणों को एक भी टिकट नहीं दिया। परिणाम सामने है, जहां तमिलनाडु की पिछली विधानसभा में बीजेपी के 4 विधायक थे इस बार घटकर इस बार एक हो गया।

अन्नामलाई ने सनातन विरोधी द्रविड़ राजनीति का खुलकर विरोध किया। ये कहने का साहस दिखाया कि डीएमके और एआईडीएमके ने तमिलनाडु में ब्राह्मणों की स्थिति यहूदियों जैसी कर दीं है। 'एन मन, एन मक्कल' पदयात्रा से उन्होंने पूरे प्रदेश को नाप दिया। आक्रामक भाषण से लोगों तक बीजेपी की विचाधारा पहुंचाई, सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं में लोकप्रिय हुए। बड़ी तादाद में हिंदूवादी लोग बीजेपी से जुड़े। उनके इन्ही प्रयासों का नतीजा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ 11.24 वोट हासिल किए लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव की कैंडिडेट लिस्ट में अन्नामलाई का नाम शामिल नहीं था।

तमिलनाडू में काँग्रेस गठबंन्धन की सरकार हारी है पीएम नरेन्द्र मोदी नही। कांग्रेस 18 सीट से 5 पर आई है! ख़ुद को हराने वाले के सामने सरेंडर करने से जीत अपनी नही हो जाती। सत्ता में आप थे, भाजपा नही! सत्ता से बाहर आपका 40 साल पुराना गठबंन्धन रहा है! हराने वाले की गोद मे बैठकर आप जीत नही जाते। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शुरुआती उत्साह आगे वास्तविक नीतियों और प्रशासनिक फैसलों में कितना बदलता है। फिल्मी स्टारडम भीड़ तो जुटा सकता है, लेकिन बूथ स्तर का संगठन, कार्यकर्ता और लगातार संघर्ष ही असली राजनीति तय करते हैं। करुणानिधि भी फिल्मों का स्क्रिप्ट राइटर था, जयललिता हीरोइन और एम जी रामचन्द्रन हीरो जैसा ही था।

सोशल मीडिया पर कांग्रेस ने राहुल गाँधी को ऐसे पेश किया जैसे टीवीके विजय की जीत राहुल गाँधी की वजह से हुई है और विजय भाजपा को हराकर सत्ता में आया है! बड़ा सवाल ये है कि क्या काँग्रेस अब राहुल गाँधी को हार की जिम्मेदारी से बचाने और सत्ता सुख के लिए बेशर्मी और गद्दारी की सारी सीमाएं पार कर चुकी है? ऑपेरशन सिन्दूर में जिस तरह पाकिस्तान ने 9 एयरबेस और आतंकी अड्डे तबाह होने के बाद भारत के डीजीएमओ को फोन करके सीजफायर की भीख मांगी, फिर सीजफायर के बाद विजय जुलूस निकाला था, उसी तरह कांग्रेस ने तमिलनाडू में अपनी ही गठबंन्धन सरकार की हार के बाद पाला बदलकर जीत का जश्न मनाया। कांग्रेस ने चुनाव में 28 में से 23 सीट हारने के बाद, हराने वाले के सामने सरेंडर कर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली और साथ लड़ने वाले साथी की पीठ में छुरा घोंपकर जीत के जश्न में शामिल हो गई।

बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस ने गठबंन्धन क्यों किया, समर्थन क्यों दिया ? राजनीति में हर पार्टी अपना लाभ हानि देखने और सोचने के लिए स्वतंत्र है लेकिन बेशर्मी और गद्दारी की सीमा पार तब हो जाती है जब अपनी ही सरकार की हार और अपने ही उम्मीदवारों को हराने वाले के साथ बैठकर ये दिखाया जाए कि हमने जीतकर सरकार बनाई है! विजय की तो मजबूरी है। क्या जनता जानती नही है कि तमिलनाडू में काँग्रेस गठबंन्धन सरकार की करारी हार हुई है! विजय की जीत और सरकार बनने का श्रेय राहुल गाँधी का है तो 28 में से 23 सीट हार का श्रेय किसका है ? जबकि पिछली बार काँग्रेस को 25 में से 18 सीट मिली थी और राहुल गाँधी तब स्टालिन के कंधे पर हाथ रखकर फ़ोटो खिंचवाते थे!

स्टालिन ने वैसे भी सरकारी तिजोरी खाली कर रखी थी, हाँ विजय सरकार को पुरे तमिलनाडु को ईसाई स्टेट बना देने के वादे पर और बडे पैमाने पर धर्म परिवर्तन करने के लिए "वैटिकन सिटी" से और ईसाई देशो से भरपूर फंडिंग मिल सकती है। जिस तमिलनाडु विधानसभा में सनातन को नष्ट करने की बात कही गयी, उसी विधानसभा में अध्यक्ष ने बाइबिल सुना सत्र की शुरुआत की। विश्व की प्राचीनतम संस्कृति को समाप्त करने का आव्हान और एक विदेशी संस्कृति का गुणगान, क्या यही है भारत का वन-वे सेकुलरिज्म?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं.

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