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मानवाधिकार आयोगों में रिक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र-NHRC और राज्यों से मांगा जवाब

Ashish verma
5 Oct 2026 11:32 PM IST
मानवाधिकार आयोगों में रिक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र-NHRC और राज्यों से मांगा जवाब
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में देशभर के मानवाधिकार आयोगों में रिक्त पदों और उनके कामकाज से जुड़ी एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को इस मामले पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और सभी राज्यों से जवाब मांगा है। याचिका में मानवाधिकार आयोगों में खाली पदों और उनकी कार्यप्रणाली से संबंधित मुद्दे उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से जवाब मांगे जाने के बाद अब केंद्र, एनएचआरसी और राज्य सरकारों को इस मामले में अपना पक्ष अदालत के सामने रखना होगा। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मानवाधिकार आयोग नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों पर कार्रवाई करने वाली प्रमुख संस्थाओं में शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
मानवाधिकार आयोगों की स्थिति को लेकर दाखिल जनहित याचिका में रिक्तियों के साथ उनके कामकाज का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया गया है कि मानवाधिकार संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं का प्रभावी तरीके से काम करना जरूरी है।
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अदालत की ओर से नोटिस जारी किए जाने या जवाब मांगने का मतलब मामले में लगाए गए आरोपों या दावों को सही ठहराना नहीं होता। अब संबंधित पक्ष अपना पक्ष और उपलब्ध तथ्य अदालत के सामने रखेंगे, जिसके बाद मामले में आगे सुनवाई होगी।
केंद्र और NHRC से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के साथ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी जवाब मांगा है। एनएचआरसी राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की सुरक्षा और उनसे संबंधित शिकायतों को देखने वाली महत्वपूर्ण संस्था है।
आयोग के सामने हिरासत में कथित उत्पीड़न, मानवाधिकार उल्लंघन और नागरिक अधिकारों से जुड़े विभिन्न प्रकार के मामले पहुंचते हैं। आयोग शिकायतों पर संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांग सकता है और निर्धारित कानूनी ढांचे के तहत मामलों पर विचार करता है।
ऐसे में आयोग में पद खाली होने या उसके कामकाज से जुड़ी समस्या का सवाल सीधे संस्था की कार्यक्षमता से जुड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के जरिए इन्हीं विषयों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाया गया है।
सभी राज्यों से भी जवाब तलब
इस मामले का दायरा केवल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से भी जवाब मांगा है। राज्यों में मानवाधिकारों से संबंधित शिकायतों के लिए राज्य मानवाधिकार आयोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
अब राज्यों को अपने यहां मानवाधिकार आयोगों की स्थिति, रिक्त पदों और कामकाज से संबंधित जानकारी अदालत के सामने रखनी पड़ सकती है। हालांकि राज्यों से वास्तव में कौन-कौन सी विस्तृत जानकारी मांगी गई है, यह अदालत के आदेश और मामले की आगे की कार्यवाही से स्पष्ट होगा।
सभी राज्यों को इस मामले में शामिल किए जाने से यह जनहित याचिका राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संस्थाओं की स्थिति से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला बन गई है।
रिक्त पद क्यों हैं महत्वपूर्ण?
किसी भी आयोग के प्रभावी कामकाज के लिए उसके प्रमुख पदों का भरा होना जरूरी माना जाता है। मानवाधिकार आयोगों के पास बड़ी संख्या में शिकायतें पहुंच सकती हैं और उन्हें सुनवाई, रिपोर्ट तथा अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।
यदि स्वीकृत पद लंबे समय तक खाली रहते हैं तो मामलों के निपटारे की गति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है। इसी वजह से संवैधानिक
और वैधानिक संस्थाओं में रिक्त पदों को समय पर भरने का मुद्दा अक्सर अदालतों के सामने भी उठता रहा है।
हालांकि मौजूदा याचिका में देशभर के आयोगों में कितने पद खाली हैं और किन राज्यों में किस स्तर पर रिक्तियां हैं, इन आंकड़ों की पुष्टि संबंधित पक्षों द्वारा अदालत में दिए जाने वाले जवाबों से होगी।
मानवाधिकार आयोगों की अहम भूमिका
मानवाधिकार आयोगों की स्थापना का उद्देश्य नागरिकों के मानवाधिकारों की सुरक्षा से संबंधित मामलों को संस्थागत मंच उपलब्ध कराना है। कोई व्यक्ति मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित शिकायत आयोग के सामने रख सकता है।
आयोग संबंधित शिकायत पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत विचार कर सकता है और जरूरत पड़ने पर अधिकारियों से जानकारी या रिपोर्ट मांग सकता है। मानवाधिकार संरक्षण से जुड़े मामलों में आयोग की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि यह पीड़ितों को अपनी शिकायत सामने रखने का एक अलग संस्थागत माध्यम उपलब्ध कराता है।
इसी कारण आयोगों की स्वतंत्रता, पर्याप्त संसाधन, नियुक्तियां और नियमित कामकाज महत्वपूर्ण विषय माने जाते हैं।
कामकाज का मुद्दा भी याचिका में शामिल
जनहित याचिका केवल पदों की रिक्तियों से संबंधित नहीं है, बल्कि मानवाधिकार आयोगों के कामकाज का सवाल भी इसमें उठाया गया है। आयोगों के प्रभावी ढंग से काम करने के लिए केवल पद भरना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि प्रशासनिक संसाधन और शिकायतों के समयबद्ध निपटारे जैसी व्यवस्थाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं।
अब केंद्र, एनएचआरसी और राज्यों के जवाब आने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि विभिन्न स्तरों पर मानवाधिकार आयोगों की मौजूदा स्थिति क्या है और याचिका में उठाए गए मुद्दों पर संबंधित सरकारों तथा संस्थाओं का क्या कहना है।
अदालत के अगले कदम पर नजर
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में जवाब मांगा है। इसके बाद संबंधित पक्ष अदालत में अपना पक्ष दाखिल करेंगे। इन जवाबों का अध्ययन करने के बाद शीर्ष अदालत मामले में आगे की सुनवाई करेगी।
इस दौरान अदालत यह देख सकती है कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर किसी निर्देश की आवश्यकता है या नहीं। अंतिम निर्णय मामले की सुनवाई, पक्षकारों की दलीलों और अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के आधार पर होगा।
इसलिए मौजूदा चरण को अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। अभी सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र, एनएचआरसी और राज्यों का पक्ष जानने की प्रक्रिया शुरू की है।
देशभर के मानवाधिकार आयोगों पर नजर
इस जनहित याचिका के बाद देशभर के मानवाधिकार आयोगों में नियुक्तियों और उनकी कार्यप्रणाली का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। सभी राज्यों से जवाब मांगे जाने के कारण आने वाले समय में अलग-अलग राज्य मानवाधिकार आयोगों की स्थिति से जुड़ी जानकारी भी अदालत के सामने आ सकती है।
मानवाधिकार संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं के लिए पर्याप्त पद, संसाधन और प्रभावी कार्यप्रणाली महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका ने इन्हीं सवालों को सामने रखा है।
अब इस मामले में केंद्र सरकार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य सरकारों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे। उनके जवाबों के बाद ही मानवाधिकार आयोगों में रिक्तियों और कामकाज को लेकर याचिका में उठाए गए सवालों की पूरी तस्वीर सामने आ सकेगी और सुप्रीम कोर्ट आगे की दिशा तय करेगा।
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