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बेटे की मौत, गरीबी के चलते शव लेने नहीं पहुंच पाया पिता, रक्तदाता समूह ने की मिसाल पेश

Nilmani Pal
5 Jun 2026 6:54 AM IST
बेटे की मौत, गरीबी के चलते शव लेने नहीं पहुंच पाया पिता, रक्तदाता समूह ने की मिसाल पेश
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यूपी। दिल्ली से सुपौल (बिहार) स्थित अपने घर जाने के लिए निकला युवक आर्थिक तंगी के चलते मौत के बाद भी अपने गांव नहीं पहुंच सका। चार दिन पहले युवक की ट्रेन से गिरकर मौत हो गई थी। शिनाख्त के बाद घरवालों को घटना की जानकारी दी गई। पिता ने शव लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनके पास इटावा आने तक के पैसे नहीं हैं। ऐसे में वे शव को कैसे ले जाएंगे। इसके बाद एक रक्तदाता समूह ने पहल की। दिल्ली में रह रही बहन को किराया देकर इटावा बुलाया और युवक का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कर दिया गया।

पुलिस ने बताया कि इकदिल थाना क्षेत्र में दिल्ली-हावड़ा रेलवे ट्रैक पर 31 मई को बुआपुरा के पास एक युवक का शव पड़ा मिला था। घटनास्थल से करीब 50 मीटर दूर पड़े मिले आधार कार्ड से युवक की पहचान बिहार के सुपौल जनपद के लालगंज ब्लॉक स्थित छातापुर निवासी 20 वर्षीय भल्लू कुमार पुत्र महादेव उरांव के रूप में हुई। काफी कोशिश के बावजूद परिजनों से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था। इस पर एक स्थानीय रक्तदाता समूह आगे आया और किसी तरह युवक के गांव के प्रधान से बात कर परिजनों से संपर्क किया और घटना की जानकारी दी। रक्तदाता समूह के संस्पक सदस्य शरद तिवारी ने बताया कि बेटे की मौत की खबर सुनकर परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

पिता महादेव उरांव ने दिल पर पत्थर रख अपनी गरीबी का हवाला देते हुए शव लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा- मेरे पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि इटावा आकर अपने बेटे के अंतिम दर्शन कर सकूं। परिवार की मजबूरी जानकर रक्तदाता समूह के सदस्यों ने अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी ली। समूह के सदस्यों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि भल्लू का अंतिम संस्कार विधि-विधान से कराया जाएगा। रक्म समूह को मृतक की बहन संजीता के दिल्ली में होने की जानकारी मिली। इसपर बस का किराया भेज उसकी बहन को इटावा बुलाया गया। बहन के आने के बाद गुरुवार को यमुना घाट पर भल्लू कुमार का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस दौरान रक्तदाता समूह के शरद तिवारी, राजीव लोचन दीक्षित, सौरभ परिहार, आदित्य प्रताप सिंह और अर्जुन राजपूत आदि मौजूद रहे।

अपने पति कुलदीप के साथ आई बहन संजीता ने बताया कि उसके माता-पिता दोनों बिहार में गांव में ही रहते हैं। उनके पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि वे अपने बेटे का शव तक देख सकते। ऐसे में क्या करते। इसीलिए उन्होंने इटावा में ही अंतिम संस्कार करने को कह दिया था। यह कहते हुए संजीता की आंखें भर आईं। संजीता और उसका पति कुलदीप दोनों दिव्यांग हैं और दिल्ली में मजदूरी कर किसी तरह जीवनयापन करते हैं। उसने बताया कि बुधवार को रक्तदाता समूह के सदस्यों का फोन आया। उनके पास इटावा आने के लिए किराए तक के पैसे नहीं थे। समूह के सदस्यों ने बस कंडक्टर को ऑनलाइन रुपये भेजकर उनके सफर की व्यवस्था कराई। बुधवार रात वह अपने पति के साथ इटावा पहुंचीं, जहां उनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था भी रक्तदाता समूह ने कराई। संजीता ने बताया कि तीन बहनों और दो भाइयों में भल्लू सबसे छोटा था। वह हरियाणा के सोनीपत में मजदूरी करता था और कुछ दिन पहले ही दिल्ली आकर काम करने लगा था।


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