भारत
हाई कोर्ट ने मूक-बधिर युवती से दुष्कर्म मामले में आरोपी की जिला कोर्ट जमानत रद्द की
Shantanu Roy
3 Feb 2026 9:04 PM IST

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Indore. इंदौर। इंदौर हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए जिला कोर्ट द्वारा मूक-बधिर युवती से दुष्कर्म करने वाले आरोपी को दी गई जमानत को रद्द कर दिया। जिला कोर्ट ने पहले यह कहते हुए आरोपी को जमानत दे दी थी कि आरोपी ने युवती को सहमति से ले गया था या बिना सहमति के यह साक्ष्य का विषय है। पीड़िता की ओर से हाई कोर्ट में जमानत रद्द करने के लिए याचिका प्रस्तुत की गई थी। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर ने याचिका स्वीकार करते हुए जिला कोर्ट के जमानत आदेश को निरस्त कर दिया।
इस मामले में पीड़िता की ओर से पेश एडवोकेट शन्नो शगुफ्ता खान ने बताया कि यह घटना एमआईजी पुलिस थाना क्षेत्र में 4 अप्रैल 2025 को हुई थी। पीड़िता की उम्र उस समय 18 वर्ष 9 माह थी और वह मूक-बधिर तथा 50 प्रतिशत मंदबुद्धि है। आरोपित युवकों ने सुबह 10 बजे उसके घर से जबरन उसे उठाया और उसके साथ दुष्कर्म किया। बाद में युवती को वापस उसके घर छोड़ दिया गया। युवती के माता-पिता ने इसकी गुमशुदगी दर्ज कराई। जब युवती घर पहुंची, उसने सांकेतिक भाषा का उपयोग कर अपने माता-पिता को बताया कि उसके साथ दुष्कर्म हुआ है।
पुलिस ने मामले की जांच की और आरोपित में से एक युवक को गिरफ्तार कर लिया, जबकि दूसरा आरोपी फरार हो गया। घटना के दो माह बाद ही जिला कोर्ट ने आरोपी की ओर से प्रस्तुत जमानत आवेदन को स्वीकार करते हुए उसे जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि युवती को सहमति से ले जाने या बिना सहमति के यह साक्ष्य का मामला है। एडवोकेट शगुफ्ता खान ने बताया कि उन्होंने जिला कोर्ट में जमानत का विरोध किया था, लेकिन उनकी आपत्ति को दरकिनार कर जमानत दे दी गई। इसके बाद पीड़िता की ओर से हाईकोर्ट में जमानत निरस्त करने की याचिका दायर की गई। हाईकोर्ट ने याचिका पर विचार करते हुए जिला कोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को रद्द कर दिया।
न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के गंभीर मामलों में पीड़िता की संवेदनशीलता और उसकी विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। इस फैसले से यह संदेश गया कि पीड़िताओं के अधिकार और सुरक्षा को कानूनी प्रक्रिया में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। हाई कोर्ट के इस आदेश ने जिले में समान न्याय और संवेदनशील मामलों में न्यायिक सतर्कता का उदाहरण पेश किया। मामले में आरोपी की जमानत निरस्त होने के बाद अब वह अदालत की प्रक्रिया और पुलिस जांच के अधीन रहेगा। यह कदम पीड़िताओं और उनके परिवारों के लिए न्याय की उम्मीद को मजबूत करेगा। हाई कोर्ट के आदेश से यह भी स्पष्ट हुआ कि गंभीर दुष्कर्म मामलों में जिला कोर्ट द्वारा अनावश्यक जमानत देने के फैसले की उच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा की जा सकती है। इस घटना ने एक बार फिर न्यायपालिका की संवेदनशीलता और पीड़िताओं के संरक्षण की आवश्यकता को उजागर किया है।
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