
मणिपुर। संवैधानिक पदों पर बैठे जजों के लिए बनाए गए नैतिक नियमों और आचार संहिता को ताक पर रखने का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। दिल्ली हाईकोर्ट के जज और बाद में मणिपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे जस्टिस (रिटायर्ड) सिद्धार्थ मृदुल अपने 16 साल के कार्यकाल के दौरान एक एलपीजी डिस्ट्रीब्यूशन एजेंसी भी चलाते रहे। इसका खुलासा भारत पेट्रोलियम (BPCL) की एक डीलरशिप से जुड़े विवाद और उनके पूर्व मैनेजर की पत्नी द्वारा हाईकोर्ट में दायर की गई एक याचिका से हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत पेट्रोलियम (BPCL) ने साल 1984 में सिद्धार्थ मृदुल को 'किचन फ्लेम' नाम से एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरशिप आवंटित की थी। नियमों के मुताबिक, संवैधानिक अदालतों के जजों के लिए यह एक अलिखित आचार संहिता है कि उनका सरकार, निजी पार्टियों, पीएसयू या कंपनियों के साथ कोई आर्थिक, कॉन्ट्रैक्ट या व्यावसायिक संबंध नहीं होना चाहिए। हितों के टकराव से बचने के लिए उन्हें अपनी संपत्तियों और शेयरहोल्डिंग की जानकारी भी देनी होती है। लेकिन जस्टिस मृदुल 21 नवंबर 2024 को मणिपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पद से रिटायर होने तक इस गैस एजेंसी के मालिक बने रहे, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है। जस्टिस मृदुल ने 1986 में दिल्ली हाईकोर्ट में एक वकील के तौर पर प्रैक्टिस शुरू की थी। मार्च 2008 में वह उसी अदालत में जज नियुक्त हुए और अक्टूबर 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। हैरान करने वाली बात यह है कि इतने अहम न्यायिक पदों पर रहते हुए भी उन्होंने गैस एजेंसी के कॉन्ट्रैक्ट को कई बार रिन्यू कराया।
यह एग्रीमेंट 25 अगस्त 1995, 24 अगस्त 2005, 23 अगस्त 2010, 25 अगस्त 2015, 7 मई 2025 और पिछले साल 29 सितंबर (24 अगस्त 2030 तक की वैधता के साथ) को रिन्यू किया गया। बीपीसीएल के साथ हुए सबसे ताजा एग्रीमेंट के स्टाम्प पेपर पर जस्टिस मृदुल की तस्वीर लगी है और 'किचन फ्लेम' के लिए उनके हस्ताक्षर भी मौजूद हैं। इस पूरे मामले का भंडाफोड़ तब हुआ जब 'किचन फ्लेम' का कामकाज संभालने वाले पूर्व मैनेजर दीपक यादव की विधवा मोनिका यादव ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। मोनिका ने अदालत से गुहार लगाई थी कि बीपीसीएल को एजेंसी का मालिकाना हक उनके (मोनिका के) नाम पर ट्रांसफर करने का निर्देश दिया जाए। अदालत ने बीपीसीएल को इस अर्जी पर दो महीने के भीतर फैसला लेने को कहा था। इसी बीच, दिसंबर 2025 में जस्टिस मृदुल के खिलाफ एक पब्लिक ग्रीवांस यानी जनशिकायत दर्ज हुई, जिसमें बताया गया कि गैस एजेंसी के मालिक फुल टाइम जज के तौर पर सेवाएं दे चुके हैं।
इस शिकायत के बाद बीपीसीएल ने जस्टिस मृदुल को 30 जनवरी, 26 फरवरी और 29 मई को कारण बताओ नोटिस भेजे। तेल कंपनी ने कहा कि उनकी पूर्व लिखित अनुमति के बिना न्यायिक पद पर रहते हुए एजेंसी चलाना कॉन्ट्रैक्ट के नियमों का सीधा उल्लंघन है। कंपनी ने पूछा कि क्यों न उनकी डिस्ट्रीब्यूटरशिप सस्पेंड कर दी जाए। जस्टिस मृदुल की तरफ से बीपीसीएल के किसी भी नोटिस का जवाब नहीं दिया गया। आखिरकार, कार्रवाई करते हुए बीपीसीएल ने 6 जुलाई को 'किचन फ्लेम' की एलपीजी डीलरशिप सस्पेंड कर दी। एजेंसी सस्पेंड होने के बाद मोनिका यादव ने दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि उन्होंने सभी नियमों का पालन किया है और अदालत से उनके पक्ष में आदेश भी था। इसके बावजूद पुराने मालिक (जस्टिस मृदुल) की गलतियों और बीपीसीएल की निष्क्रियता के कारण उन्हें बेवजह पीड़ित किया जा रहा है।





