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महाकाल की भस्म आरती में दिखा जटाधारी स्वरूप, मखाने की माला से हुआ विशेष श्रृंगार

Nil dhankar
30 May 2026 9:44 AM IST
महाकाल की भस्म आरती में दिखा जटाधारी स्वरूप, मखाने की माला से हुआ विशेष श्रृंगार
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उज्जैन। ज्येष्ठ अधिकमास की शुक्ल पक्षी की पूर्णिमा पर विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में अलौकिक भस्म आरती देखने को मिली, जिसमें शामिल होने के लिए देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं की भारी-भीड़ उमड़ी। पूरा मंदिर परिसर शिवभक्तों के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। महाकाल मंदिर में परंपरा के अनुसार, भस्म आरती के लिए वीरभद्र से आज्ञा लेकर शनिवार तड़के मंदिर के कपाट खोले गए। इसके बाद सबसे पहले भगवान महाकाल को जल अर्पित कर स्नान करवाया गया। इसके बाद उन्हें दूध, दही, घी, शक्कर और शहद से बने पंचामृत से बाबा का अभिषेक किया गया। इस दौरान गर्भगृह में मंत्रोच्चार से वातावरण पूरी तरह शिवमय हो गया।

विशेष अभिषेक के बाद बाबा महाकाल का बेहद श्रृंगार किया गया। इस बार बाबा महाकाल को जटाधारी स्वरूप में सजाया गया। उनके मस्तक पर प्रीकात्मक त्रिनेत्र बनाया गया और उन्हें मखाने की विशेष माला पहनाई गई। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की गई। भस्म आरती के दौरान शंख, डमरू और घंटी की गूंज से पूरा वातावरण बेहद दिव्य और आध्यात्मिक हो गया। पूरा मंदिर परिसर घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहा। हर ओर भक्ति और आस्था का माहौल था।

भस्म संसार की नश्वरता का प्रतीक है। यह संदेश देती है कि सब कुछ अंततः राख हो जाता है, जिससे भक्तों को अहंकार त्यागने की प्रेरणा मिलती है। कहा जाता है कि पहले चिता की भस्म का उपयोग होता था, लेकिन अब परंपरा के अनुसार भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडों (उपलों) और पवित्र वृक्षों (शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलताश और बेर) की लकड़ियों को जलाकर तैयार की जाती है। इस दौरान महिलाएं भी शामिल हो सकती हैं लेकिन परंपरा के अनुसार आरती के समय वे घूंघट में रहकर बाबा के दर्शन करती हैं। अधिकमास पूर्णिमा होने के कारण इस दिन का महत्व और भी ज्यादा बढ़ गया। वहीं, अपने आराध्य को देखने के लिए देर रात से ही भक्तों की लंबी लाइनें लग गई थीं।

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