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बिगड़ते रिश्तों का असर, महंगा हो सकता है क्रूड और यूरिया

Saba Naaz
25 July 2026 8:21 PM IST
बिगड़ते रिश्तों का असर, महंगा हो सकता है क्रूड और यूरिया
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भारत: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव एक बार फिर गहराता नजर आ रहा है। अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ते मतभेद और एक-दूसरे पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों की नई लहर ने अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह तनाव लंबे समय तक जारी रहा तो कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, एलएनजी, उर्वरक, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई जरूरी औद्योगिक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।

अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक और रणनीतिक टकराव पहले से जारी है, लेकिन हाल के दिनों में दोनों देशों की ओर से उठाए गए नए कदमों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। अमेरिका ने पेंटागन की चीनी सैन्य कंपनियों से जुड़ी सूची का विस्तार किया है, जिसमें अलीबाबा, बाइडू और बीवाईडी जैसी बड़ी चीनी कंपनियों को शामिल किया गया है। इसके जवाब में चीन ने भी कई अमेरिकी कंपनियों पर निर्यात नियंत्रण लागू कर दिए हैं।

चीन ने 10 अमेरिकी संस्थाओं को निर्यात नियंत्रण सूची में शामिल करते हुए दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं की आपूर्ति पर रोक लगाई है। इनमें ऐसे उत्पाद शामिल हैं जिनका इस्तेमाल सामान्य उद्योगों के साथ-साथ सैन्य क्षेत्र में भी किया जा सकता है। इसके अलावा चीन ने कई अमेरिकी रक्षा कंपनियों को सरकारी खरीद प्रक्रिया से बाहर कर दिया है।

दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने रूस विरोधी प्रतिबंधों के तहत कई चीनी और हांगकांग की कंपनियों को प्रतिबंध सूची में शामिल किया। इसके बाद चीन ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए कई यूरोपीय कंपनियों पर निर्यात प्रतिबंध लगा दिए। इस आपसी कार्रवाई से दुनिया की व्यापार व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है और कंपनियों को कच्चे माल तथा जरूरी उपकरणों की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।

भारत के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। भारत कई जरूरी औद्योगिक कच्चे माल और इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिए चीन पर निर्भर है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि चीन से आपूर्ति प्रभावित होती है तो ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर असर पड़ सकता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ने और उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना है।

इससे पहले भी चीन द्वारा रेअर अर्थ मेटल्स की आपूर्ति में रुकावट के कारण भारतीय ऑटोमोबाइल कंपनियों को परेशानी का सामना करना पड़ा था। रेअर अर्थ तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और कई आधुनिक तकनीकों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव केवल अमेरिका-चीन और यूरोपीय संघ के विवादों से ही नहीं बढ़ा है, बल्कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने भी स्थिति को मुश्किल बना दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी चिंताओं ने ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति को प्रभावित किया है। ईंधन और खाद की कीमतों में बढ़ोतरी का असर दुनिया भर के किसानों और आम लोगों पर पड़ सकता है।

हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत करीब 88 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 96 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। वहीं एशियाई एलएनजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उर्वरक बाजार में भी दबाव बना हुआ है। डीएपी खाद की कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे कृषि क्षेत्र पर असर पड़ सकता है।

धातुओं के बाजार में भी हलचल देखी जा रही है। तांबे और एल्युमिनियम जैसी औद्योगिक धातुओं की कीमतों में तेजी आई है। इनका इस्तेमाल निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात में दुनिया को वैकल्पिक सप्लाई चेन और मजबूत व्यापार व्यवस्था की जरूरत है। अगर बड़े देशों के बीच तनाव कम नहीं हुआ तो आने वाले समय में महंगाई, उत्पादन लागत और आर्थिक अस्थिरता जैसी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। भारत समेत कई विकासशील देशों के लिए यह जरूरी होगा कि वे घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आयात निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से कदम उठाएं।

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