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नगरोटा बगवां। हर साल की भांति वन सम्पदा को आगजनी से बचाने के सरकार के दावे इस बार भी जमीं पर धुंआ धुंआ होते आम देखे जा सकते हैं । अगर आगजनी का सिलसिला यूं ही चलता रहा और मानसून देरी से पहुंचा तो स्थित कितनी भयावह होगा, इसकी कल्पना मात्र से नुकसान का जायजा लगाना मुश्किल नहीं या यूं कहा जाए कि फरिश्ता बन मॉनसून जल्द आए और जंगलों की आग को बुझा कर मानवता पर अपनी कृपा बरसाए । मई महीने में ही शायद ही कोई वन आग से बच पाया हो । प्राप्त जानकारी के मुताबिक वन विभाग के मलां परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाली करीब 10 हजार हेक्टेयर वन भूमि में से 100 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि आज की तारीख में आग की चपेट में आ चुकी है । कई-कई दिनों तक झुलसते जंगलों से वन संपदा के साथ पर्यावरण की कितनी हानि हो रही है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसी रेंज के पठयार, नरवाना, सद्दूं, मस्सल, मलां, सरोत्री, कंडी, बड़ोह तथा पालमपुर रेंज के दरंग, घनेटा व झरेट आदि क्षेत्र खासे प्रभावित हैं। कई स्थानों पर घरों और भवनों को आग से बचाने के लिए दमकल का भी सहारा लेना पड़ा है। मंगलवार रात भी पठियार, परौर बल्ला आदि क्षेत्र में जंगल सुलगते थे। मलां वन परिक्षेत्र की देखभाल के लिए 14 वन रक्षकों, 2 उप रेंज अधिकारियों, 14 वन मित्रों, दो चतुर्थ श्रेणी के अतिरिक्त करीब एक दर्जन फायर वाचर की भी व्यवस्था की है, लेकिन लंबे चौड़े क्षेत्र में निगरानी के लिए मानव शक्ति, संसाधन व लोगों के सहयोग को अपर्याप्त बताया जा रहा है । हालंकि विभाग ने वनों को आग से बचाने के फायर सीजन में एहतियाती कदम उठाने की योजनाएं तो फाइलों में बाकायदा बनाई हैं, लेकिन धरातल में कितनी पुख्ता साबित हो रही है, यह ऐसी ही घटनाओं से पुष्ट होती नजर आ रही हैं ।
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