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सड़क पर नमाज़ पढ़ने की व्यवहार्यता इस्लामी शरीयत की रोशनी में

Nil dhankar
10 April 2025 1:36 PM IST
सड़क पर नमाज़ पढ़ने की व्यवहार्यता इस्लामी शरीयत की रोशनी में
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लेखिका

इनशा वारसी

फ्रैंकोफोने और पत्रकारिता अध्ययन, जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्र

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मेरठ प्रशासन ने सड़कों पर नमाज़ पढ़ने पर रोक लगा दी और इसका उल्लंघन करने पर मुक़दमा दर्ज करने के साथ साथ पासपोर्ट और शस्त्र लइसेंस रद्द करने का प्रावधान किया है। दिल्ली के बीजेपी विधायक मोहन सिंह बिष्ट ने कहा कि नमाज मस्जिद में पढ़ना चाहिए, सड़क पर नमाज पढ़कर लोगों को परेशान करना गलत है। हालांकि नमाज़ के लिए उचित स्थान मस्जिद है, न कि सड़क, फिर भी कुछ स्थानों पर लोग बिना सोचे-समझे मस्जिद से बाहर सड़क पर भी सफें बना लेते हैं। शरियत ने किसी को यह अनुमति नहीं दी है कि वह राहगीरों का रास्ता रोककर नमाज़ पढ़ने लगे। बल्कि हदीस में स्पष्ट रूप से यह बताया गया है कि आने-जाने के रास्ते में नमाज़ न पढ़ी जाए।

दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में यह एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जो वर्षों से बनी हुई है। इसका सीधा ज़िम्मेदार मस्जिद प्रबंधन समिति है, न कि कोई सरकार। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलेमा-ए-हिंद या इमाम काउंसिल को राष्ट्रीय स्तर पर यह घोषणा करनी चाहिए कि किसी भी शहर में मस्जिद के बाहर सड़क पर नमाज़ न पढ़ी जाए। इस घोषणा को लगातार दो-तीन जुमे की नमाज़ में देशभर की मस्जिदों में दोहराया जाना चाहिए। यदि मस्जिद में स्थान की कमी है, तो एक ही मस्जिद में दो बार जुमे की नमाज़ पढ़ी जा सकती है या अन्य कोई वैकल्पिक उपाय निकाला जा सकता है। ऐसे मौकों पर उलेमा और समाज के वरिष्ठ व्यक्तियों को आगे आकर व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना चाहिए। यह कहना कि "अगर हिंदू लोग सड़कों पर धार्मिक आयोजन कर सकते हैं, तो हम भी करेंगे," एक उचित तर्क नहीं है। यह याद रखने की ज़रूरत है कि भारतीय मुसलमानों के धार्मिक नियम शरियत से तय होते हैं, न कि किसी अन्य समुदाय के रीति-रिवाजों से। अगर भारतीय मुसलमान खुद से इस समस्या का समाधान नहीं निकालते, तो सरकार इसमें हस्तक्षेप करेगी। जिस प्रकार तीन तलाक और लाउडस्पीकर पर अज़ान जैसे मुद्दे हमारी तरफ से हल नहीं हुए, तो सरकार ने इसमें हस्तक्षेप किया, उसी तरह सड़क पर नमाज़ का मुद्दा भी यदि हल नहीं हुआ, तो सरकार इसमें दखल देगी। इससे देशभर में नकारात्मक माहौल बनेगा और इस्लाम की गलत छवि प्रस्तुत होगी। स्थिति की गंभीरता इस हद तक बढ़ गई है कि कुछ लोग चलती ट्रेन के स्लीपर कोच में भी जमात बनाकर नमाज़ पढ़ते हैं, जबकि वहां लोगों की आवाजाही बनी रहती है। यह कोई बुजुर्गी या इबादत में श्रेष्ठता की मिसाल नहीं है। आपके पास विकल्प मौजूद हैं- आप अपनी सीट या बर्थ परबैठकर भी फ़र्ज़ अदा कर सकते हैं। देवबंद के उलेमा भी रोड पर नमाज पढ़ना सही नहीं बताते हैं। दरअसल एक बार यूपी की राजधानी लखनऊ में विधानसभा के सामने बीच सड़क पर एक शख्स ने नमाज पढ़ी थी जिसको सहारनपुर के देवबन्दी उलेमाओ ने गलत बताया था। देवबन्द के मुफ्ती अहमद ने इस पर कहा था कि "इस्लाम में इस तरह नमाज पढ़ना सही नहीं है। किसी का रास्ता रोककर नमाज़ नहीं पढ़नी चाहिए। इबादत करने के लिए मस्जिद बनाई गई है। मस्जिद में हीं नमाज अदा करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था मस्जिद बनाई गई है कि ताकि नमाज मस्जिदों में ही पढ़ें।

रसूलुल्लाह (3) जब भी किसी मामले में दो विकल्पों में से एक को चुनते, तो हमेशा आसान विकल्प को अपनाते, बशर्ते कि वह गुनाह न हो। (सहीह मुस्लिम, हदीस नंबर 6045, 6048)। रसूल अल्लाह (ड) ने कहा- "सावधान! सड़कों पर बैठने से बचो!" इसपर लोगों ने कहा के रसूलुल्लाह हम (सड़क पर) बैठना नहीं छोड़ सकते क्योंकि ये (हमारे स्थान हैं) हम यहाँ बात करते हैं। रसूलुल्लाह ने जवाब दिया- अगर तुम सड़क पे बैठना ही चाहते हो तो फिर तुम्हे सड़क को उसका हक़ अदा करना होगा। लोगों ने पुछा के के सड़क का हक़ क्या है? रसूलुल्लाह ने कहा के नज़रें नीची करना, दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाना, सही कामों को बढ़ावा देना और बुराइयों से बचना। (हदीस नंबर 248, किताब 74, सहीह बुखारी)। एक दूसरी हदीस में एक बार रसूलुल्लाह ने कहा के 'मेरे लोगों के अच्छे और बुरे कामों को मेरे सामने पेश किया गया और गया और मैंने सड़क में 5 में पड़े हुए किसी पत्थर को हटा देना, उनके अच्छे कर्मों में से पाया (सहीह मुस्लिम, हदीस नंबर 1126, किताब 4)। पैगम्बर ने हमें सड़कों पर प्रार्थना करने से मना किया है। शेख अब्दुलअज़ीज़ बिन बाज ने स्पष्ट तौर पर कहा है के अनावश्यक रूप से सड़कों को अवरुद्ध करने से लोगों को परेशानी हो सकती है। अगर किसी को अस्पताल ले जाना हो तो क्या होगा? सड़क पर प्रार्थना करने वालों के लिए भी यह खतरनाक है। यह अज्ञानता या लापरवाही है के लोग प्रार्थना या आयोजन के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध करते हैं। यदि कोई मस्जिद भर चुकी है तो दूसरी मस्जिद में जाना समझदारी है और इस्लामी शिक्षा के अनुकूल भी।

नमाज़ या इबादत एक व्यक्तिगत मामला है। किसी को यह हक़ नहीं कि अपनी इबादत के लिए दूसरों को परेशानी में डाले, यहाँ तक कि आने-जाने का रास्ता बंद हो जाए। इस्लाम मुहब्बत अमन और भाईचारे की एक बेहतरीन मिसाल है। भारतीय मुसलमानों की ये जिम्मेदारी है के इस्लाम का सच्चा चेहरा गैर मुसलमानों के सामने लाएं, जिसमे पडोसी के हक़ की बात भी हो और राहगीरों के लिए रास्ता आसान करने की बात भी। हम सभी को, एक जिम्मेदार नागरिक की तरह, शांतिपूर्ण माहौल बनाने के लिए प्रशासन का समर्थन करना चहिये।

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