
दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCom) और अनिल धीरभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) से जुड़े 40,000 करोड़ के कथित बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को इस मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया है। साथ ही उद्योगपति अनिल अंबानी ने अदालत में यह वचन दिया है कि वे बिना अनुमति के भारत छोड़कर नहीं जाएंगे।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ई.ए.एस. सरमा के वकील प्रशांत भूषण ने आशंका जताई कि धोखाधड़ी के बड़े पैमाने को देखते हुए मुख्य आरोपी देश छोड़कर भाग सकता है। इस पर अंबानी के वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत को आश्वस्त किया, "मेरे मुवक्किल का देश छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। वे हर दिन अपने कार्यालय जाते हैं। मैं अदालत को वचन देता हूं कि वे बिना पूर्व अनुमति के विदेश नहीं जाएंगे।" हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को याद दिलाया कि रोहतगी ने पहले भी एक अन्य मुवक्किल के लिए ऐसा ही वचन दिया था, लेकिन वह व्यक्ति देश से भाग गया था। सरकार ने अदालत को बताया कि अंबानी के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर पहले से ही जारी है, जिससे एयरपोर्ट पर उनके किसी भी प्रयास को रोका जा सकेगा।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने जांच एजेंसियों द्वारा की गई देरी पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की कि फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट 2020 में ही आ गई थी, लेकिन सीबीआई ने पहली प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में 2025 तक का समय लगा दिया। कोर्ट ने जांच एजेंसी से कहा कि बैंक अधिकारियों के साथ मिलीभगत के हर मामले को एक ही FIR में न जोड़ें। हर बैंक का समझौता अलग है, इसलिए प्रत्येक अपराध के लिए अलग FIR होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए किसी कानूनी अनुमति (जैसे धारा 17A) के इंतजार की जरूरत नहीं है। यदि किसी अधिकारी ने साजिश या धोखाधड़ी में साथ दिया है तो उस पर तुरंत कार्रवाई की जाए।





