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हाइब्रिड बीज और बेहतर खेती-पद्धतियों से सरसों की उपज बढ़ाने का रास्ता

Shantanu Roy
7 Oct 2026 7:36 PM IST
हाइब्रिड बीज और बेहतर खेती-पद्धतियों से सरसों की उपज बढ़ाने का रास्ता
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New Delhi. नई दिल्ली। सरसों की बुवाई का मौसम नज़दीक आने के साथ एफआईसीसीआई-सीसीएस एनआईएएम की एक नई रिपोर्ट में बेहतर बीज चुनने और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन के जरिए राजस्थान और हरियाणा में उपज बढ़ाने की संभावनाओं को रेखांकित किया गया है। भारत के सरसों क्षेत्र की क्षमता का दोहन: प्रौद्योगिकी, उत्पादकता और किसान समृद्धि शीर्षक वाली रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में सरसों उत्पादन की वृद्धि खेती का रकबा बढ़ाने के बजाय प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाने पर अधिक निर्भर करेगी। राजस्थान में सरसों की उत्पादकता 2021–22 में 1,716 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, जो 2025–26 में घटकर 1,552 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह गई। इसी अवधि में हरियाणा में यह 1,914 किलोग्राम से बढ़कर 2,146 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई।
राजस्थान के किसानों के अनुभव बताते हैं कि सही बीज चुनना क्यों मायने रखता है। वज़ीरपुर तहसील के डूंगरी गाँव के एक किसान बताते हैं कि वे पिछले दस वर्षों से हाइब्रिड सरसों उगा रहे हैं। उन्होंने कहा, “इससे होने वाला अतिरिक्त मुनाफा मुझे अपने बच्चों की स्कूल फीस भरने और उन्हें अच्छे स्कूल में पढ़ाने में मदद करता है।” पिछले साल उन्होंने अपने खेत के एक हिस्से में नया हाइब्रिड बीज आज़माया और बताया कि उन्हें 8-10 क्विंटल अधिक उपज मिली। फागी तहसील के कंवरपुरा गाँव के एक किसान ने बताया कि 40 बीघा में हाइब्रिड सरसों उगाने से उन्हें प्रति बीघा 80 किलोग्राम अतिरिक्त उपज मिली। उन्होंने कहा कि बढ़ी हुई उपज से वे मल्टीक्रॉप थ्रेशर खरीद सके, जिसका इस्तेमाल अब वे आसपास के किसानों को सेवाएँ देने के लिए करते हैं।
कुछ अन्य किसानों ने स्थानीय खेती की परिस्थितियों से जुड़े लाभों का भी ज़िक्र किया। जालौर में किसानों का कहना है कि हाइब्रिड सरसों से उन्हें ओरोबैंकी के प्रबंधन में मदद मिली है। ओरोबैंकी एक परजीवी खरपतवार है, जो फसल को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। बूंदी में किसान सरसों में तेल की अधिक मात्रा को प्रमुख लाभ बताते हैं। उनके अनुभव इस बात को रेखांकित करते हैं कि बीजों के प्रदर्शन का आकलन उन चुनौतियों और प्राथमिकताओं के आधार पर करना उपयोगी है, जिनका सामना किसान अपने खेतों में करते हैं।
एफआईसीसीआई-सीसीएस एनआईएएम के अध्ययन में राजस्थान के अलवर और श्रीगंगानगर तथा हरियाणा के रेवाड़ी में सरसों की खेती करने वाले 100 किसानों का सर्वेक्षण किया गया। जिलों में हाइब्रिड बीज अपनाने की बताई गई दर अलग-अलग थी: श्रीगंगानगर में लगभग 48-50%, अलवर में 65-70% और रेवाड़ी में 75-80%। सर्वेक्षण में शामिल किसानों ने यह भी अनुमान लगाया कि प्रौद्योगिकी अपनाने और बेहतर खेती-पद्धतियों से खेतों की आमदनी में औसतन 12.9% की वृद्धि हुई और फसल का नुकसान 23% घटा।
किसानों को सोच-समझकर विकल्प चुनने में मदद देने के लिए रिपोर्ट जिला-स्तर पर खेत-प्रदर्शन और प्रशिक्षण आयोजित करने की सिफारिश करती है। इससे किसान उपज, तेल की मात्रा, फसल पकने की अवधि, फसल सुरक्षा, खेती की लागत और संभावित आमदनी के आधार पर बीजों की तुलना कर सकेंगे। रिपोर्ट में फसल की बेहतर बढ़वार और उपज के लिए वैज्ञानिक बीजोपचार, समय पर और एक समान बुवाई, संतुलित पोषण, कुशल सिंचाई, खरपतवार प्रबंधन और कीटों तथा रोगों के एकीकृत प्रबंधन की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है। सरसों ग्रामीण आजीविका और स्थानीय बाज़ारों को सहारा देती है, प्रसंस्करण उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराती है और भारत में खाद्य तेल की घरेलू उपलब्धता में योगदान देती है। रिपोर्ट के अनुसार, किसानों को सही जानकारी के आधार पर बीज और फसल प्रबंधन से जुड़े फैसले लेने में मदद देना, पूरे फसल-चक्र में उन्हें आवश्यक सहयोग देना और बाज़ार से जुड़ाव मजबूत करना ज़रूरी है, ताकि बेहतर फसल प्रदर्शन से किसानों को बेहतर आमदनी मिल सके।
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