पश्चिम बंगाल

कालीघाट मंदिर में मछली खाने पर चर्चा में शुभेंदु अधिकारी

Ratna Netam
11 Sept 2026 2:45 PM IST
कालीघाट मंदिर में मछली खाने पर चर्चा में शुभेंदु अधिकारी
x
कोलकाता। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कौशिकी अमावस्या के अवसर पर कोलकाता के प्रसिद्ध कालीघाट काली मंदिर में पूजा-अर्चना की और इसके बाद मंदिर में मछली सहित पारंपरिक भोग ग्रहण किया। जमीन पर बैठकर मछली का सिर, तली हुई मछली और बसंती पुलाव खाते उनकी तस्वीरें सामने आने के बाद बंगाल में भोजन, धार्मिक परंपरा और सनातन संस्कृति को लेकर चल रही बहस फिर चर्चा में आ गई।
यह मामला इसलिए भी सुर्खियों में है क्योंकि हाल ही में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार को लेकर की गई टिप्पणी पर पश्चिम बंगाल में विवाद खड़ा हो गया था। इसी विवाद के बीच शुभेंदु अधिकारी ने कालीघाट मंदिर में मछली का भोग ग्रहण करते हुए खुद को सनातनी हिंदू बताया और बंगाली धार्मिक परंपराओं का उल्लेख किया।
कौशिकी अमावस्या पर पहुंचे कालीघाट
शुभेंदु अधिकारी गुरुवार शाम कौशिकी अमावस्या के मौके पर कालीघाट मंदिर पहुंचे। उन्होंने मां काली की विधिवत पूजा की और आरती तथा अंजलि में हिस्सा लिया। पूजा के दौरान लाल बनारसी साड़ी, फूल और मिठाई जैसी सामग्री भी अर्पित की गई। इसके बाद उन्होंने मंदिर में परोसा गया प्रसाद ग्रहण किया।
भोग में बसंती पुलाव के अलावा कई पारंपरिक व्यंजन शामिल थे। शुभेंदु अधिकारी ने मछली का सिर और तली हुई मछली भी प्रसाद के रूप में खाई। उनकी इस गतिविधि को बंगाल की पारंपरिक धार्मिक और खान-पान संस्कृति से जोड़कर देखा जा रहा है।
मैं सनातनी हिंदू हूं'
मंदिर में पूजा के बाद शुभेंदु अधिकारी ने अपनी धार्मिक मान्यताओं को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा कि वह सनातनी हिंदू हैं। उन्होंने बताया कि महाअष्टमी के दिन मां दुर्गा की पूजा करते समय वह पूरी तरह सात्विक भोजन करते हैं। कार्तिक यानी दामोदर मास में भी वह सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। वहीं बंगाली परंपरा के मुताबिक देवी को मछली का जो भोग लगाया जाता है, उसे भी वह प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि मां काली को चढ़ाए जाने वाले बकरे की बलि का प्रसाद भी वह ग्रहण करते हैं। कालीघाट में उन्हें मंदिर के पुजारियों ने वही भोजन दिया जो उस दिन देवी को भोग के रूप में अर्पित किया गया था। उसमें मछली का सिर और तली हुई मछली शामिल थी।
बागेश्वर बाबा के बयान से शुरू हुआ था विवाद
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का एक बयान है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दुर्गा पूजा में मांसाहार के सेवन को लेकर टिप्पणी की थी। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने लोगों से दुर्गा पूजा के दौरान मछली और मांस से दूर रहने की अपील की थी। उनके बयान के बाद बंगाल में राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई।
बंगाल की खान-पान संस्कृति में मछली का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके अलावा राज्य की कुछ शक्त परंपराओं में देवी को मांसाहारी भोग अर्पित करने की धार्मिक परंपरा भी रही है। इसी कारण शास्त्री की टिप्पणी पर कई लोगों ने सवाल उठाए और इसे बंगाली धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़कर बहस शुरू हो गई।
शुभेंदु बोले अपनी राय रखने का सबको अधिकार
बागेश्वर बाबा के बयान पर शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि एक संत ने अपनी राय रखी है। जो लोग उसे स्वीकार करना चाहते हैं वे स्वीकार कर सकते हैं और जो नहीं करना चाहते वे नहीं करें। यानी उन्होंने व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता और दूसरों पर नियम लागू करने के बीच अंतर की बात की।
इस बयान के साथ कालीघाट मंदिर में उनका मछली का प्रसाद ग्रहण करना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर उन्होंने बागेश्वर बाबा के अपनी राय रखने के अधिकार का समर्थन किया, वहीं दूसरी तरफ स्वयं बंगाल की पारंपरिक धार्मिक पद्धति के अनुसार मछली का भोग ग्रहण किया।
मछली खाने की तस्वीरों ने खींचा ध्यान
कालीघाट मंदिर में शुभेंदु अधिकारी के प्रसाद ग्रहण करने की तस्वीरें और वीडियो तेजी से चर्चा में आए। इनमें उन्हें जमीन पर बैठकर बसंती पुलाव, मछली का सिर और तली हुई मछली खाते देखा गया।
आमतौर पर राजनीतिक नेताओं के मंदिर दौरे में पूजा-अर्चना की तस्वीरें चर्चा में रहती हैं, लेकिन इस बार पूजा के बाद परोसा गया भोजन ही राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। इसकी सबसे बड़ी वजह दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार को लेकर पहले से जारी विवाद है।
बंगाली पहचान से भी जुड़ा मामला
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का भी बड़ा हिस्सा है। अलग-अलग परिवारों और समुदायों में पूजा-पद्धति और खान-पान की परंपराएं अलग हो सकती हैं।
इसी वजह से किसी एक तरह की भोजन पद्धति को पूरे बंगाल की धार्मिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत करने पर अक्सर बहस होती है। शुभेंदु अधिकारी ने अपने बयान में भी इसी विविधता की तरफ इशारा किया। उन्होंने बताया कि वह कुछ धार्मिक अवसरों पर पूरी तरह सात्विक भोजन करते हैं और दूसरी परंपराओं में देवी को अर्पित मछली या अन्य प्रसाद भी ग्रहण करते हैं।
राजनीति भी हुई तेज
धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी के बाद पश्चिम बंगाल में विरोध-प्रदर्शन भी हुए। कोलकाता में उनके पोस्टर और तस्वीरें जलाने के मामले सामने आए। एक कांग्रेस नेता अतनु दास को विरोध के दौरान बागेश्वर बाबा के पोस्टर जलाने से जुड़े मामले में गिरफ्तार भी किया गया।
इससे पहले शुभेंदु अधिकारी ने धीरेंद्र शास्त्री की तस्वीरें जलाने की घटनाओं पर सख्त रुख अपनाया था। उन्होंने कहा था कि किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है लेकिन विरोध के नाम पर इस तरह की गतिविधियां स्वीकार नहीं की जाएंगी।
अब कालीघाट मंदिर में स्वयं मछली का भोग ग्रहण कर अधिकारी ने एक तरफ बंगाली परंपरा के प्रति अपना समर्थन दिखाया है तो दूसरी तरफ यह संदेश देने की कोशिश की है कि व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
सनातन परंपरा को लेकर दिया संदेश
शुभेंदु अधिकारी पिछले कुछ दिनों से सनातन परंपराओं को लेकर लगातार बयान दे रहे हैं। उन्होंने दुर्गा पूजा आयोजकों से भी धार्मिक परंपराओं का सम्मान करने और ऐसी गतिविधियों से बचने को कहा था जिनसे सनातनी मान्यताओं को ठेस पहुंचे।
ऐसे में कालीघाट मंदिर की उनकी यात्रा केवल धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रही। पूजा के बाद मछली का प्रसाद ग्रहण करने और स्वयं को सनातनी हिंदू बताने के उनके बयान ने बंगाल की धार्मिक विविधता और स्थानीय परंपराओं को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
कुल मिलाकर कौशिकी अमावस्या पर शुभेंदु अधिकारी की कालीघाट यात्रा ने बंगाल की राजनीति में चल रही 'शाकाहार बनाम मांसाहार' की बहस को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने जहां खुद को सनातनी हिंदू बताते हुए महाअष्टमी और कार्तिक मास में सात्विक भोजन करने की बात कही, वहीं बंगाली परंपरा के मुताबिक देवी को अर्पित मछली का प्रसाद भी ग्रहण किया। उनका संदेश साफ था कि धार्मिक आस्था और खान-पान की परंपराओं में विविधता हो सकती है और किसी संत की व्यक्तिगत राय को मानना या न मानना व्यक्ति की अपनी पसंद है।
Next Story