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पश्चिम बंगाल : विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी ने कालीघाट स्थित प्रसिद्ध मां काली मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद मछली वाला भोग ग्रहण किया। कौशिकी अमावस्या के अवसर पर मंदिर पहुंचे अधिकारी का यह वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसे बाबा बागेश्वर से जुड़े दुर्गापूजा के दौरान मांसाहारी भोजन नहीं करने संबंधी विवाद को शांत करने की भाजपा की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं। अधिकारी भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं और बंगाल की राजनीति में पार्टी का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। ऐसे में कालीघाट मंदिर में मछली वाला भोग ग्रहण करने के उनके कदम को धार्मिक परंपरा के साथ-साथ राजनीतिक संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, अधिकारी ने कौशिकी अमावस्या के अवसर पर गुरुवार शाम कालीघाट मंदिर का दौरा किया। शाक्त परंपरा को मानने वाले श्रद्धालुओं के लिए कौशिकी अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन देवी की आराधना, पूजा और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। कालीघाट मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।
सामने आए वीडियो में शुभेंदु अधिकारी जमीन पर बैठकर मंदिर का भोग ग्रहण करते दिखाई दे रहे हैं। उनकी थाली में मछली का एक बड़ा सिर भी नजर आया, जिसे कालीघाट के पारंपरिक भोग की विशेषताओं में शामिल बताया जाता है। इसके अलावा थाली में तली हुई मछली और बसंती पुलाव यानी पीले चावल भी परोसे गए थे।
बंगाल में शाक्त धार्मिक परंपराओं और स्थानीय खानपान के बीच गहरा संबंध है। राज्य के अनेक हिस्सों में देवी की उपासना के दौरान अलग-अलग प्रकार के भोग चढ़ाने और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा प्रचलित है। इसलिए कालीघाट में मछली वाला भोग ग्रहण करना स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ में सामान्य परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
हालांकि, शुभेंदु अधिकारी के इस कार्यक्रम का समय राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल में बाबा बागेश्वर से जुड़े दुर्गापूजा के दौरान नॉनवेज भोजन न करने वाले बयान पर विवाद पैदा हुआ था। बंगाल की खाद्य संस्कृति में मछली का विशेष स्थान होने के कारण इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। अब भाजपा के प्रमुख नेता द्वारा कालीघाट मंदिर में मछली वाला भोग ग्रहण करने को उसी विवाद से पैदा हुई असहजता दूर करने का प्रयास माना जा रहा है।
भाजपा की ओर से आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा गया है कि अधिकारी का मंदिर दौरा किसी राजनीतिक विवाद का जवाब देने के लिए था। इसलिए इसे विवाद खत्म करने की रणनीति बताना फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण और अटकल के दायरे में है। संभव है कि अधिकारी केवल धार्मिक अवसर पर मंदिर पहुंचे हों और वहां की परंपरा के अनुसार भोग ग्रहण किया हो। इसके बावजूद वीडियो सामने आने के बाद इसके राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं।
बंगाल में भोजन और धार्मिक परंपरा कई बार चुनावी तथा राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनती रही है। मछली राज्य के रोजमर्रा के खानपान और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी है। दुर्गापूजा और काली पूजा जैसे आयोजनों में भी स्थानीय परंपराओं के अनुसार भोग एवं भोजन की अलग-अलग व्यवस्थाएं देखने को मिलती हैं। इसी वजह से बाहर से आए किसी धार्मिक नेता की टिप्पणी को राज्य की संस्कृति से जोड़कर देखा जाने लगता है।
शुभेंदु अधिकारी का कालीघाट मंदिर जाना भी राजनीतिक रूप से प्रतीकात्मक माना जा रहा है। कालीघाट न केवल प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, बल्कि इसका बंगाल के धार्मिक और सामाजिक जीवन में विशेष स्थान है। अधिकारी ने कौशिकी अमावस्या जैसे महत्वपूर्ण अवसर का चयन कर देवी के प्रति अपनी आस्था प्रदर्शित की। इसके बाद स्थानीय परंपरा के अनुसार भोग ग्रहण कर उन्होंने बंगाली सांस्कृतिक पहचान के साथ जुड़ाव का संदेश दिया।
भाजपा लंबे समय से बंगाल में अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी को यहां हिंदुत्व की राजनीति के साथ स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक भावनाओं के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। बंगाल की धार्मिक परंपराएं देश के दूसरे हिस्सों से कई मायनों में अलग हैं। यहां देवी उपासना, शाक्त साधना और भोजन से जुड़े रीति-रिवाजों की विशिष्ट पहचान है।
ऐसे में दुर्गापूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर किसी प्रकार का व्यापक निषेध बताना राज्य के एक वर्ग को असहज कर सकता है। भाजपा के स्थानीय नेताओं के लिए यह जरूरी है कि वे पार्टी की धार्मिक राजनीति को बंगाल की परंपराओं के अनुरूप प्रस्तुत करें। शुभेंदु अधिकारी का मछली वाला भोग ग्रहण करना इस संतुलन का सार्वजनिक प्रदर्शन माना जा रहा है।
दूसरी ओर, राजनीतिक विरोधी इस घटना को भाजपा के भीतर अलग-अलग सांस्कृतिक दृष्टिकोणों के उदाहरण के रूप में पेश कर सकते हैं। वे सवाल उठा सकते हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय धार्मिक विमर्श और बंगाल की स्थानीय परंपराओं के बीच उसका आधिकारिक रुख क्या है। भाजपा समर्थकों का तर्क हो सकता है कि हिंदू धर्म में क्षेत्रीय विविधता मौजूद है और अलग-अलग स्थानों की पूजा परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
कौशिकी अमावस्या पर कालीघाट मंदिर में शुभेंदु अधिकारी की उपस्थिति ने फिलहाल नॉनवेज विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है। वीडियो में उनका पारंपरिक भोग ग्रहण करना सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा इस घटनाक्रम पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया देती है या इसे नेता प्रतिपक्ष की व्यक्तिगत धार्मिक यात्रा तक सीमित रखती है।
फिलहाल अधिकारी के इस कदम ने एक साथ दो संदेश दिए हैं। पहला संदेश मां काली और शाक्त परंपरा के प्रति उनकी आस्था का है। दूसरा संदेश बंगाल की भोजन संस्कृति और धार्मिक विविधता को स्वीकार करने का माना जा रहा है। राजनीतिक रूप से इसका कितना असर पड़ेगा, यह आने वाले दिनों की प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होगा।





