पश्चिम बंगाल

TMC में टूट से बदला बंगाल का सियासी समीकरण

Saba Naaz
2 Aug 2026 8:22 PM IST
TMC में टूट से बदला बंगाल का सियासी समीकरण
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कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा सरकार बनने के बाद अब मुख्य विपक्षी दल की भूमिका को लेकर नया सियासी संघर्ष शुरू हो गया है। कभी राज्य की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत रही तृणमूल कांग्रेस अब अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी से जूझ रही है। इसका फायदा उठाने के लिए माकपा, कांग्रेस और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) समेत कई दल सक्रिय हो गए हैं। सभी पार्टियां भाजपा सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्ष के रूप में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल में विपक्ष की तस्वीर तेजी से बदल रही है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर ममता बनर्जी गुट के अलावा कई अन्य धड़े अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऋतब्रत बनर्जी गुट और एनसीपीआइ जैसे नए राजनीतिक विकल्पों के उभरने से पार्टी की एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं। वहीं, विपक्षी दल इस स्थिति को अपने लिए अवसर के रूप में देख रहे हैं।

हाल ही में हुई तृणमूल कांग्रेस की 21 जुलाई की रैली और वाम छात्र संगठनों की 24 जुलाई की रैली के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है कि फिलहाल ममता बनर्जी का गुट और माकपा के नेतृत्व वाला वाममोर्चा विपक्ष की दौड़ में आगे नजर आ रहे हैं। तृणमूल नेताओं का दावा है कि चुनावी हार के बावजूद ममता बनर्जी की लोकप्रियता अभी भी कायम है। उनका कहना है कि ममता के लगातार जिला दौरों और जनसंपर्क अभियान से पार्टी दोबारा मजबूत होगी।

दूसरी ओर, ऋतब्रत बनर्जी गुट का कहना है कि विधानसभा के अंदर विपक्ष की वास्तविक भूमिका वही निभा रहा है। इस गुट के नेताओं का दावा है कि वे केवल विरोध की राजनीति नहीं बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों पर रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाना चाहते हैं।

माकपा को भी बंगाल में अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की उम्मीद नजर आ रही है। पार्टी का कहना है कि राज्य की राजनीति में लंबे समय से चली आ रही "या तृणमूल या भाजपा" वाली स्थिति अब बदल रही है। माकपा अब अपने पुराने संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की रणनीति पर काम कर रही है।

कांग्रेस भी इस बदलते राजनीतिक माहौल में संभावनाएं तलाश रही है। पार्टी को उम्मीद है कि मुस्लिम और शहरी मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर वह विपक्ष की भूमिका में जगह बना सकती है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि तृणमूल की अंदरूनी कलह से जनता के सामने नए राजनीतिक विकल्पों की संभावना बढ़ी है।

बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से इस वर्ग का बड़ा समर्थन हासिल करती रही है, लेकिन अब माकपा, कांग्रेस और आईएसएफ भी इस वोट बैंक में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले समय में मुस्लिम मतदाताओं का रुख राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अब्दुल मतीन के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के प्रति अल्पसंख्यक समाज का भरोसा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यदि ममता बनर्जी जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर फिर से सक्रिय होती हैं तो उनका समर्थन बरकरार रह सकता है। हालांकि, माकपा, कांग्रेस और आईएसएफ के लिए भी नए अवसर बने हैं।

आईएसएफ नेता नौशाद सिद्दीकी की पार्टी भी मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आईएसएफ अपना संगठन मजबूत करती है तो वह भविष्य में बंगाल की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकती है।

फिलहाल बंगाल में सभी विपक्षी दल एक-दूसरे की रणनीति और ताकत को परख रहे हैं। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि भाजपा सरकार के सामने राज्य में मुख्य विपक्षी चेहरा कौन बनेगा। तृणमूल की अंदरूनी स्थिति, माकपा की वापसी की कोशिश और कांग्रेस-आईएसएफ की रणनीति बंगाल के नए राजनीतिक समीकरणों को तय करेगी।

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