पश्चिम बंगाल

Kolkata मिड-डे मील विवाद: शिक्षा मंत्री बर्मन बोले—पोषण के लिए सिर्फ अंडा ही जरूरी नहीं

Gulabi Jagat
23 Jun 2026 7:47 PM IST
Kolkata मिड-डे मील विवाद: शिक्षा मंत्री बर्मन बोले—पोषण के लिए सिर्फ अंडा ही जरूरी नहीं
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Kolkata, कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय संस्था इस्कॉन (ISKCON) को सौंपने के राज्य सरकार के फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस पूरी योजना को लेकर सबसे बड़ा विवाद बच्चों के खाने में मिलने वाले अंडे को हटाने और इस काम से जुड़े हजारों स्थानीय रसोइयों व स्वयं सहायता समूहों (SHG) के रोजगार पर संकट को लेकर खड़ा हुआ है। चौतरफा घिरी सरकार का बचाव करते हुए राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने मंगलवार को मीडिया के सामने इस मुद्दे पर अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी। शिक्षा मंत्री ने सीधे शब्दों में कहा कि "अंडा ही पोषण का एकमात्र विषय या स्रोत नहीं है। केवल अंडे में ही सारा पोषण छुपा है, ऐसी धारणा पूरी तरह से गलत है। दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी पूरी तरह शाकाहारी भोजन खाकर भी बेहद स्वस्थ और लंबा जीवन जीती है।"कोलकाता में पायलट प्रोजेक्ट के तहत शुरुआतस्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन के इस बयान से अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि राज्य सरकार विपक्ष और सामाजिक संगठनों के कड़े विरोध के बावजूद अपने फैसले पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। सरकार इस नई व्यवस्था को फिलहाल कोलकाता के स्कूलों में एक 'पायलट प्रोजेक्ट' (प्रायोगिक परियोजना) के तौर पर शुरू करने जा रही है। मंत्री ने संकेत दिए कि अगर कोलकाता का यह मॉडल पूरी तरह सफल रहता है, तो आने वाले समय में इसे राज्य के अन्य जिलों और ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में भी विस्तारित (विस्तार) करने पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, "हम इसे अभी एक प्रयोग के तौर पर देख रहे हैं। यदि भविष्य में इसके परिणाम सकारात्मक और बेहतर आते हैं, तो निश्चित रूप से राज्य के अन्य हिस्सों में भी इस तरह की आधुनिक और स्वच्छ व्यवस्था लागू करने के बारे में सोचा जाएगा।"प्रशासनिक दिक्कतों को बताया मुख्य वजहअक्षय पात्र (इस्कॉन) जैसी संस्था को मिड-डे मील की कमान सौंपने के पीछे प्रशासनिक और व्यावहारिक तर्कों को सामने रखते हुए शिक्षा मंत्री ने अपनी पुरानी यादें भी साझा कीं। उन्होंने कहा, "मैं खुद भी लंबे समय तक स्कूल प्रशासन से जुड़ा रहा हूँ, इसलिए मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि हर दिन सैकड़ों बच्चों के लिए मिड-डे मील का सुचारू संचालन करना कितना कठिन और थका देने वाला काम है। हर सुबह बाजार से ताजा सामान और सब्जियां खरीदने से लेकर, साफ-सफाई बनाए रखना और गुणवत्तापूर्ण खाना तैयार करना एक बेहद बड़ी जिम्मेदारी होती है।" उन्होंने आगे कहा कि राज्य के कई शिक्षक संगठनों और प्रधानाध्यापकों ने भी कई बार शिकायत की थी कि मिड-डे मील की व्यवस्था संभालने के चक्कर में शिक्षकों का मुख्य ध्यान पढ़ाई से भटक जाता है। इस काम में लगे रसोइए भी बेहद कम मानदेय में दिन-रात कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी कई बार सिस्टम की कमियां सामने आती हैं। सरकार इन्हीं पुरानी समस्याओं और सिरदर्द से बाहर निकलने के लिए एक पारदर्शी और वैज्ञानिक रास्ता तलाश रही थी, जिसे इस्कॉन के सेंट्रलाइज्ड किचन के जरिए पूरा किया जा सकता है।अंडे और रोजगार पर क्यों खड़ा हुआ है विवाद?दरअसल, पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील योजना के तहत सरकारी स्कूलों में बच्चों को हफ्ते में कम से कम दो से तीन दिन उबले हुए अंडे दिए जाते हैं, जिसे कुपोषण से लड़ने के लिए बेहद जरूरी माना जाता है। चूंकि इस्कॉन पूरी तरह से सात्विक और शाकाहारी भोजन (बिना प्याज-लहसुन और मांस-मछली-अंडा) तैयार करता है, इसलिए अभिभावकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को डर है कि इस फैसले से गरीब बच्चों की थाली से प्रोटीन का एक बड़ा और सस्ता स्रोत छिन जाएगा। इसके अलावा, वर्तमान में चल रही व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर गरीब महिलाएं और स्वयं सहायता समूह स्कूल परिसरों में ही खाना बनाते हैं, जिससे उन्हें रोजगार मिलता है। यदि खाना सीधे आधुनिक मशीनीकृत किचन से बनकर आएगा, तो इन हजारों महिलाओं के सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो जाएगा। विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर ममता बनर्जी सरकार पर तीखा हमला बोला है और इसे स्थानीय रोजगार और बच्चों के खानपान के अधिकारों पर कुठाराघात बताया है।

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