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उत्तरकाशी: उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध चारधामों में शामिल यमुनोत्री धाम के कपाट आगामी 11 नवंबर 2026 को भैयादूज के पावन पर्व पर शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाएंगे। विजयादशमी के अवसर पर मंदिर समिति और तीर्थ पुरोहितों की मौजूदगी में कपाट बंद करने की तिथि और शुभ मुहूर्त निर्धारित किया गया। इसके अनुसार, बुधवार सुबह 10 बजकर 28 मिनट पर वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच मां यमुना के कपाट बंद होंगे।
कपाट बंद होने की तिथि तय होने के साथ ही चारधाम यात्रा के इस प्रमुख पड़ाव पर शीतकालीन व्यवस्थाओं को लेकर तैयारियां तेज होने की उम्मीद है। हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां यमुना के दर्शन के लिए यमुनोत्री पहुंचते हैं। सर्दियों में ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में मौसम प्रतिकूल होने के कारण मंदिर के कपाट परंपरा के अनुसार बंद कर दिए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालु मां यमुना के दर्शन और पूजा-अर्चना उनके शीतकालीन गद्दी स्थल पर कर सकते हैं।
सुबह 10:28 बजे बंद होंगे कपाट
मंदिर समिति और तीर्थ पुरोहित समाज की ओर से पंचांग और धार्मिक परंपराओं के आधार पर कपाट बंद करने का मुहूर्त निकाला गया। तय कार्यक्रम के अनुसार, 11 नवंबर को सुबह 10 बजकर 28 मिनट पर शुभ लग्न में कपाट बंद करने की प्रक्रिया संपन्न होगी। इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-पाठ और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे।
भैयादूज का पर्व यमुनोत्री धाम की परंपरा में विशेष महत्व रखता है। इसी दिन मां यमुना के मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद किए जाते हैं। कपाट बंद होने के साथ ही धाम में नियमित दर्शन की प्रक्रिया अगले यात्रा सत्र तक के लिए विराम ले लेगी। श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा सत्र के समापन का महत्वपूर्ण अवसर होता है।
खरसाली के खुशीमठ में होंगे मां यमुना के दर्शन
यमुनोत्री धाम के कपाट बंद होने के बाद मां यमुना की पूजा-अर्चना खरसाली स्थित उनके शीतकालीन गद्दी स्थल खुशीमठ में की जाएगी। सर्दियों के दौरान श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां यमुना के दर्शन कर सकेंगे। इस व्यवस्था से धार्मिक परंपराएं जारी रहती हैं और भक्तों को शीतकाल में भी देवी की पूजा करने का अवसर मिलता है।
खरसाली उत्तरकाशी जिले का महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यमुनोत्री धाम की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी इसका विशेष महत्व है। कपाट बंद होने के बाद देवी की पूजा से जुड़ी परंपराएं यहीं निभाई जाती हैं। इस दौरान स्थानीय तीर्थ पुरोहित और मंदिर से जुड़े लोग धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्था संभालते हैं।
चारधाम यात्रा का अहम पड़ाव है यमुनोत्री
यमुनोत्री उत्तराखंड की चारधाम यात्रा के प्रमुख तीर्थों में से एक है। अन्य तीन धाम गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ हैं। हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित यमुनोत्री मंदिर मां यमुना को समर्पित है। प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक आस्था और कठिन पहाड़ी मार्ग के कारण यह तीर्थ देशभर के श्रद्धालुओं के लिए खास महत्व रखता है।
यमुनोत्री पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सड़क मार्ग से जानकी चट्टी तक जाना होता है। इसके बाद मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्ते पर पैदल यात्रा करनी पड़ती है। यात्रा के दौरान मौसम, रास्ते की स्थिति और ऊंचाई का ध्यान रखना जरूरी होता है। विशेषकर यात्रा सत्र के अंतिम दिनों में श्रद्धालुओं को स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की ओर से जारी निर्देशों का पालन करना चाहिए।
ठंड बढ़ने के साथ बदलती हैं यात्रा की परिस्थितियां
हिमालयी क्षेत्र में शीतकाल के दौरान तापमान में गिरावट, बर्फबारी और खराब मौसम की संभावना बढ़ जाती है। ऊंचाई पर स्थित मंदिरों तक पहुंचने वाले रास्तों पर इन परिस्थितियों का असर पड़ सकता है। इसी वजह से परंपरागत रूप से सर्दियों के दौरान यमुनोत्री धाम के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और पूजा-अर्चना शीतकालीन गद्दी स्थल पर जारी रहती है।
यात्रा के समापन से पहले श्रद्धालुओं के लिए जरूरी है कि वे अपनी यात्रा की योजना मौसम और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाएं। यात्रा मार्ग, परिवहन और दर्शन से संबंधित ताजा जानकारी के लिए प्रशासन तथा आधिकारिक पर्यटन स्रोतों की सूचना देखना उपयोगी रहेगा।
श्रद्धालुओं में बढ़ी उत्सुकता
कपाट बंद करने की तिथि और शुभ मुहूर्त घोषित होने के बाद श्रद्धालुओं के बीच धार्मिक कार्यक्रम को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। भैयादूज के दिन होने वाले अनुष्ठान के साथ यमुनोत्री धाम का नियमित यात्रा सत्र समाप्त हो जाएगा। इसके बाद मां यमुना की पूजा खरसाली के खुशीमठ में शीतकालीन परंपराओं के अनुसार जारी रहेगी।
यमुनोत्री धाम के कपाट 11 नवंबर को सुबह 10:28 बजे बंद किए जाने का कार्यक्रम निर्धारित है। श्रद्धालुओं के लिए यह तिथि न केवल यात्रा सत्र के समापन का संकेत है, बल्कि मां यमुना की पूजा के शीतकालीन चरण की शुरुआत भी है।
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