उत्तराखंड

फर्जी प्रमाण-पत्र मामले में दो युवक पकड़े

Kavita2
25 Sept 2026 2:40 PM IST
फर्जी प्रमाण-पत्र मामले में दो युवक पकड़े
x

गदरपुर। तहसील क्षेत्र में कथित तौर पर कूटरचित अभिलेखों के आधार पर स्थायी निवास, जाति और अन्य प्रमाण-पत्र बनवाने का मामला सामने आया है। तहसील प्रशासन की प्रारंभिक जांच में अनियमितता सामने आने के बाद संबंधित प्रमाण-पत्रों को निरस्त करने की कार्रवाई की गई है। मामले में भूमिका सामने आने पर गदरपुर निवासी निखिल वर्मा और शुभम हुडिया से पूछताछ की गई, जिसके बाद दोनों को गदरपुर कोतवाली पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। दोनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की प्रक्रिया अभी बाकी है।

शुक्रवार को तहसीलदार लीना चंद्रा ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि प्रारंभिक जांच में कुछ व्यक्तियों द्वारा कूटरचित अभिलेखों के आधार पर प्रमाण-पत्र तैयार करवाए जाने की बात सामने आई है। मामला सामने आने के बाद तहसील प्रशासन ने संबंधित दस्तावेजों की जांच शुरू की।

जांच में जिन प्रमाण-पत्रों और अभिलेखों को लेकर अनियमितता सामने आई, उनके संबंध में प्रशासनिक कार्रवाई की जा रही है। संबंधित प्रमाण-पत्रों को निरस्त करने के साथ मामले से जुड़े लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।

प्रशासन के अनुसार इन प्रमाण-पत्रों का इस्तेमाल देहरादून में नीट परीक्षा के बाद एमबीबीएस में प्रवेश प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाना था। इसी कारण मामले को गंभीरता से लेते हुए अभिलेखों की जांच की गई। जांच में दस्तावेजों के कूटरचित होने की बात प्रारंभिक रूप से सामने आने के बाद कार्रवाई तेज की गई।

तहसील प्रशासन ने मामले में गदरपुर निवासी निखिल वर्मा और शुभम हुडिया को पूछताछ के लिए बुलाया। दोनों से प्रमाण-पत्रों और उनसे जुड़े दस्तावेजों के संबंध में जानकारी ली गई। पूछताछ के बाद प्रशासन ने दोनों को गदरपुर कोतवाली पुलिस को सौंप दिया।

हालांकि शुक्रवार तक दोनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। पुलिस को मामला सौंपे जाने के बाद अब आगे की कानूनी कार्रवाई की जानी है। आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद ही होगी।

मामला स्थायी निवास और जाति प्रमाण-पत्र जैसे महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों से जुड़ा होने के कारण प्रशासन इसकी विस्तृत जांच कर रहा है। ऐसे प्रमाण-पत्रों का उपयोग शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश, आरक्षण और विभिन्न सरकारी सुविधाओं में किया जाता है। इसलिए इनकी सत्यता सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण होता है।

प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्यों के बाद तहसील प्रशासन ने उन प्रमाण-पत्रों को निरस्त करने की कार्रवाई शुरू की, जिनके लिए कूटरचित अभिलेख इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि दस्तावेज तैयार कराने की पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था।

तहसीलदार लीना चंद्रा के मुताबिक मामले की शुरुआती जांच में कुछ लोगों द्वारा कूटरचित अभिलेख प्रस्तुत किए जाने की जानकारी मिली है। इन अभिलेखों के आधार पर स्थायी निवास, जाति और अन्य प्रमाण-पत्र तैयार करवाए गए थे।

प्रशासन अब यह पता लगाने में जुटा है कि संबंधित अभिलेख कहां और किस तरह तैयार किए गए। साथ ही प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए किस स्तर पर इनका इस्तेमाल किया गया और क्या इनके अलावा भी इसी प्रकार के अन्य प्रमाण-पत्र जारी हुए हैं, इसकी जांच की जा सकती है।

प्रकरण का संबंध नीट के बाद एमबीबीएस प्रवेश से होने की जानकारी सामने आने के कारण इसकी गंभीरता और बढ़ गई है। प्रशासन के अनुसार इन दस्तावेजों का उपयोग देहरादून में एमबीबीएस में प्रवेश प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाना था।

स्थायी निवास और जाति प्रमाण-पत्र का इस्तेमाल प्रवेश प्रक्रिया में पात्रता और आरक्षण संबंधी लाभ के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में यदि गलत या कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर प्रमाण-पत्र तैयार कराया जाता है तो इससे प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है।

इसी को देखते हुए तहसील प्रशासन ने प्रारंभिक जांच के बाद तत्काल कार्रवाई की। संदिग्ध प्रमाण-पत्रों को निरस्त करने के साथ मामले में सामने आए दो युवकों को पुलिस के सुपुर्द किया गया है।

निखिल वर्मा और शुभम हुडिया से तहसील प्रशासन ने पहले पूछताछ की। इसके बाद दोनों को गदरपुर कोतवाली पुलिस के हवाले किया गया। अब पुलिस संबंधित अभिलेखों, प्रमाण-पत्रों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर मामले की आगे जांच करेगी।

प्रशासनिक जांच में यह भी देखा जा रहा है कि कूटरचित अभिलेख तैयार करने में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका तो नहीं रही। यदि जांच में अन्य लोगों की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है।

मामले में फिलहाल प्रारंभिक जांच के तथ्य सामने आए हैं। इसलिए जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, उनके खिलाफ आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध मानना उचित नहीं होगा। पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही जिम्मेदारी स्पष्ट होगी।

तहसील प्रशासन ने प्रमाण-पत्रों की सत्यता की जांच के दौरान सामने आए दस्तावेजों को अपने स्तर पर खंगाला है। जिन मामलों में गड़बड़ी पाई गई, उनमें प्रमाण-पत्र निरस्त करने की प्रक्रिया अपनाई गई है।

इस कार्रवाई के बाद तहसील क्षेत्र में प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले अभिलेखों की सत्यता को लेकर भी सतर्कता बढ़ने की संभावना है। स्थायी निवास और जाति प्रमाण-पत्र जैसे दस्तावेजों के लिए आवेदक की ओर से प्रस्तुत रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण होती है।

फिलहाल प्रशासन ने मामले में दो युवकों को पुलिस के सुपुर्द कर दिया है। उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद पुलिस जांच आगे बढ़ेगी। जांच में यह स्पष्ट किया जाएगा कि कूटरचित दस्तावेज कैसे तैयार हुए, उनका इस्तेमाल किस स्तर तक किया गया और पूरे मामले में अन्य लोगों की क्या भूमिका रही।

तहसीलदार लीना चंद्रा के मुताबिक प्रारंभिक जांच में कूटरचित अभिलेखों के आधार पर प्रमाण-पत्र बनवाए जाने का मामला सामने आया है। प्रशासन ने संबंधित प्रमाण-पत्रों को निरस्त करने की कार्रवाई की है और आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए प्रकरण पुलिस को सौंप दिया गया है।

Next Story