
खटीमा (ऊधम सिंह नगर)। उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र खटीमा से एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाक्रम सामने आया है। खटीमा के कुटरी गांव में ईसाई धर्म अपना चुके थारू जनजाति के 70 ग्रामीणों ने गुरुवार को पूरे विधि-विधान के साथ दोबारा सनातन धर्म में वापसी कर ली है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध और पावन लोक पर्व 'हरेला' के शुभ अवसर पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में साधु-संतों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में एक भव्य शुद्धिकरण हवन-यज्ञ का आयोजन किया गया। इस यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद सभी 70 ग्रामीणों की स्वेच्छा से स्वधर्म में वापसी कराई गई। इस ऐतिहासिक कदम के बाद से न केवल कुटरी गांव बल्कि पूरे खटीमा क्षेत्र में थारू आदिवासी समाज और स्थानीय जनता के बीच भारी उत्साह और खुशी का माहौल देखा जा रहा है।
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ समय पहले कुटरी गांव के सीधे-साधे और भोले-भाले थारू आदिवासी परिवारों को कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा कथित तौर पर बहला-फुसलाकर और विभिन्न प्रलोभन देकर उनका मतांतरण (धर्म परिवर्तन) करा दिया गया था। जब इस सामूहिक मतांतरण की भनक स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों को लगी, तो पूरे क्षेत्र की जनता में भारी आक्रोश फैल गया। स्थानीय निवासियों ने इसकी शिकायत तुरंत पुलिस और प्रशासन से की। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने त्वरित संज्ञान लिया और मतांतरण के खेल में शामिल मुख्य आरोपियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करते हुए उन्हें सलाखों के पीछे भेजा था। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद से ही क्षेत्र में ऐसे तत्वों पर पैनी नजर रखी जा रही थी।
पुलिसिया कार्रवाई के समानांतर इस पूरे मामले को सुलझाने और प्रभावित परिवारों को उनकी मूल जड़ों से दोबारा जोड़ने के लिए एक बड़ा सामाजिक प्रयास भी शुरू हुआ। कुटरी गांव की ग्राम प्रधान दीपा देवी ने इस दिशा में एक अनुकरणीय पहल की। उन्होंने प्रधान प्रतिनिधि नरेंद्र सिंह, मनोहर पांडे, दीवान रावत, कविंद्र कफलिया और राधेश्याम राणा जैसे क्षेत्र के प्रमुख प्रबुद्ध नागरिकों के साथ मिलकर एक विशेष टीम बनाई। इस टीम ने ईसाई धर्म अपना चुके थारू परिवारों के घर-घर जाकर उनसे सीधा संवाद स्थापित किया। उन्होंने इन परिवारों को उनकी प्राचीन थारू संस्कृति, गौरवशाली इतिहास और सनातन परंपराओं के महत्व के बारे में विस्तार से समझाया। सकारात्मक और आत्मीय संवाद का असर यह हुआ कि सभी प्रभावित लोग बिना किसी दबाव के, पूरी तरह से अपनी स्वेच्छा से सनातन धर्म में लौटने को तैयार हो गए।
इसके बाद, इन सभी परिवारों की गरिमापूर्ण वापसी के लिए प्रकृति के प्रतीक और नई शुरुआत के पावन त्योहार 'हरेला' का दिन चुना गया। गुरुवार को गांव में आयोजित मुख्य कार्यक्रम के दौरान पंडित हरीश जोशी और पूज्य साधु मोहन गिरी महाराज ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शुद्धिकरण यज्ञ संपन्न कराया। हवन कुंड की पवित्र अग्नि के समक्ष वैदिक ऋचाओं के गुंजन ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद, साधु-संतों द्वारा सभी 70 ग्रामीणों के हाथों में पवित्र कलावा (रक्षासूत्र) बांधा गया, माथे पर तिलक लगाया गया और चरणामृत पिलाकर उन्हें आधिकारिक तौर पर सनातन धर्म के विशाल परिवार में दोबारा शामिल किया गया। इस भावुक क्षण में कई ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं और उन्होंने अपनी मूल संस्कृति में लौटने पर गहरा संतोष व्यक्त किया।
इस सफल आयोजन के बाद मीडिया से बात करते हुए ग्राम प्रधान दीपा देवी ने समाज को एक बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अपनी प्राचीन संस्कृति, जड़ों और मूल धर्म की रक्षा के लिए पूरे समाज का हर समय जागरूक और संगठित होना बेहद जरूरी है। उन्होंने अपील की कि समाज के हर तबके को ऐसे प्रयासों के लिए आगे आना चाहिए ताकि कोई भी असामाजिक या राष्ट्रविरोधी तत्व सीधे-साधे और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को गुमराह न कर सके। उन्होंने क्षेत्रवासियों से सतर्क रहने और मतांतरण कराने वाले गिरोहों के किसी भी प्रकार के झांसे में न आने की पुरजोर अपील की। थारू समाज के प्रबुद्ध जनों ने भी इस घर वापसी का स्वागत करते हुए कहा कि यह कदम उनकी जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में मील का पत्थर साबित होगा।





