
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में संगठनात्मक समन्वय को लेकर खींचतान सामने आई है। पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने आपत्ति जताई है। पार्टी नेतृत्व ने रावत को अलग से कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ाने की सलाह दी है और उन्हें दिल्ली भी बुलाया गया। दूसरी ओर रावत ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी राजनीतिक सक्रियता और कार्यक्रमों को लेकर अपना पक्ष रखा है।
कांग्रेस की उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा ने एक अक्टूबर को हरीश रावत को पत्र भेजकर उनकी यात्रा पर सवाल उठाए थे। पत्र में कहा गया कि यात्रा के संबंध में न तो प्रदेश प्रभारी से चर्चा की गई और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से परामर्श हुआ। विधानसभा चुनाव नजदीक होने का उल्लेख करते हुए सैलजा ने कहा कि इस समय पार्टी को एकजुट होकर काम करने की जरूरत है और प्रदेश कांग्रेस के समानांतर कोई कार्यक्रम पार्टी के हित में नहीं होगा। उन्होंने रावत से ऐसे कार्यक्रमों को आगे नहीं बढ़ाने को कहा।
हरीश रावत की यात्रा को लेकर विवाद उस समय और बढ़ गया, जब कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से उन्हें दिल्ली बुलाए जाने की खबर सामने आई। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, नेतृत्व की चिंता मुख्य रूप से यह है कि विधानसभा चुनाव की तैयारियों के दौरान वरिष्ठ नेताओं की गतिविधियां संगठन की रणनीति के साथ समन्वय में हों। रावत से भी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के तहत मिलकर काम करने को कहा गया।
हरीश रावत ने अपनी गतिविधियों को लेकर सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी कोशिश कांग्रेस के समानांतर कोई व्यवस्था खड़ी करने की नहीं है। उन्होंने अपने कार्यक्रमों को जनता से संवाद और पार्टी को मजबूत करने की कवायद के रूप में पेश किया है। साथ ही वह खुद को पार्टी आलाकमान और संगठन के अनुशासन के प्रति समर्पित बताते रहे हैं।
रावत ने पांच अक्टूबर के लिए कुमाऊं क्षेत्र में काशीपुर, जसपुर, रामनगर और कालाढूंगी होते हुए हल्द्वानी तक कार्यक्रम की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से साझा की थी। इसी प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर प्रदेश संगठन और पार्टी नेतृत्व की आपत्ति खुलकर सामने आई।
इस घटनाक्रम के बाद उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक तालमेल का सवाल चर्चा में आ गया है। हरीश रावत प्रदेश कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और मुख्यमंत्री के साथ केंद्रीय मंत्री सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। राज्य में उनका अपना राजनीतिक आधार भी रहा है। ऐसे में उनकी स्वतंत्र राजनीतिक सक्रियता पर प्रदेश प्रभारी की आपत्ति को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
कांग्रेस नेतृत्व की ओर से जोर इस बात पर है कि चुनाव से पहले सभी वरिष्ठ नेता साझा रणनीति के तहत जनता के बीच जाएं। प्रदेश प्रभारी के पत्र में भी इसी बात पर विशेष जोर दिया गया है। सैलजा ने साफ कहा कि चुनावी समय में संगठन से अलग किसी कार्यक्रम से पार्टी की एकजुटता को लेकर गलत संदेश जा सकता है।
हरीश रावत की राजनीतिक सक्रियता पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ी है। बीमारी से उबरने के बाद उन्होंने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जनता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं से संपर्क बढ़ाया। हरिद्वार क्षेत्र में भी वह सक्रिय रहे हैं और इसके बाद कुमाऊं में जनसंवाद कार्यक्रम की योजना सामने आई।
यात्रा को लेकर विवाद के बीच रावत की एक सोशल मीडिया पोस्ट भी चर्चा में रही। दिल्ली बुलाए जाने की खबरों के बीच उन्होंने लिखा कि “आसमानी शक्ति” उनका मार्गदर्शन करे। इस पोस्ट को उनकी मौजूदा राजनीतिक स्थिति से जोड़कर देखा गया, हालांकि उन्होंने इसमें सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व के फैसले का विरोध नहीं किया था।
पार्टी के भीतर इस पूरे मामले में मुख्य विवाद यात्रा की अनुमति से ज्यादा प्रदेश संगठन के साथ समन्वय का बताया जा रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, प्रदेश के कुछ नेताओं ने रावत की यात्रा के तरीके को लेकर प्रभारी के सामने अपनी बात रखी थी। इसके बाद सैलजा ने संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से चर्चा की और रावत को पत्र भेजकर कार्यक्रमों पर आपत्ति दर्ज कराई।
उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने सत्तारूढ़ भाजपा से मुकाबले के साथ अपने नेताओं के बीच समन्वय बनाए रखने की भी चुनौती है। हरीश रावत की यात्रा को लेकर सामने आए विवाद ने चुनावी तैयारियों के बीच इसी मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है।
हरीश रावत की यात्रा पहले भी प्रदेश कांग्रेस के भीतर चर्चा का विषय रही है। मंगलौर से गुजरने के दौरान उनकी यात्रा को लेकर कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन के साथ सार्वजनिक मतभेद सामने आने की खबर भी आई थी। इसके बाद पार्टी नेतृत्व की ओर से उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर ध्यान बढ़ा और मामला केंद्रीय संगठन तक पहुंचा।
कांग्रेस हाईकमान की प्राथमिकता फिलहाल उत्तराखंड में संगठन को एकजुट रखकर विधानसभा चुनाव की तैयारी आगे बढ़ाने की है। यही वजह है कि प्रदेश प्रभारी ने अपने पत्र में व्यक्तिगत या समानांतर कार्यक्रमों के बजाय सामूहिक रणनीति पर जोर दिया है। दूसरी तरफ हरीश रावत अपनी सक्रियता को पार्टी और जनता के बीच संपर्क मजबूत करने की कोशिश बताते रहे हैं।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद हरीश रावत के आगामी कार्यक्रम किस स्वरूप में आगे बढ़ते हैं। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि उनके जनसंवाद कार्यक्रम प्रदेश कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रमों के साथ समन्वय बनाकर आयोजित होते हैं या उनमें कोई बदलाव किया जाता है।
फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को चुनाव से पहले चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ पार्टी नेतृत्व संगठनात्मक अनुशासन और साझा चुनावी रणनीति पर जोर दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ हरीश रावत जनता और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में उनके कार्यक्रम और कांग्रेस नेतृत्व का रुख इस विवाद की आगे की दिशा तय करेगा।





