उत्तराखंड

बाघ से ज्यादा वैरायटी का खाना खाता है तेंदुआ, रिसर्च में खुला राज

nidhi
5 Oct 2026 10:53 AM IST
बाघ से ज्यादा वैरायटी का खाना खाता है तेंदुआ, रिसर्च में खुला राज
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बाघ और तेंदुए के आहार में बड़ा फर्क
देहरादून: जंगल में बाघ और तेंदुआ दोनों ही बड़े शिकारी माने जाते हैं, लेकिन दोनों की खाने की पसंद में बड़ा अंतर सामने आया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक अध्ययन में पाया गया है कि बाघ के मुकाबले तेंदुए का आहार कहीं ज्यादा विविध है। बाघ जहां मुख्य रूप से कुछ बड़े और मध्यम आकार के वन्यजीवों के शिकार पर निर्भर रहता है, वहीं तेंदुआ बड़े शिकार से लेकर मेंढक, कृंतक और सरीसृप तक को अपने भोजन में शामिल कर लेता है। यह अध्ययन महाराष्ट्र के सह्याद्रि टाइगर रिजर्व में किया गया। शोधकर्ताओं ने बाघ, तेंदुए और ढोल यानी जंगली कुत्तों के कुल 107 मल नमूनों का विश्लेषण किया। जांच के दौरान इन शिकारी वन्यजीवों के आहार में कुल 14 अलग-अलग शिकार प्रजातियों की पहचान हुई।
अध्ययन में सबसे दिलचस्प अंतर बाघ और तेंदुए के भोजन को लेकर सामने आया। बाघ का आहार अपेक्षाकृत कम प्रजातियों तक सीमित पाया गया, जबकि तेंदुए के भोजन की सूची काफी लंबी थी। रिसर्च के मुताबिक बाघ मुख्य रूप से गौर, सांभर, काकड़, जंगली सुअर, माउस डियर और चौसिंगा जैसे वन्यजीवों का शिकार करता पाया गया। ये ऐसे शिकार हैं जिनसे बाघ को पर्याप्त मात्रा में भोजन मिल सकता है।
दूसरी तरफ तेंदुए के आहार में सांभर, चीतल, जंगली सुअर और काकड़ जैसे मध्यम आकार के खुर वाले वन्यजीवों के साथ कई छोटे जीव भी शामिल मिले। तेंदुए के भोजन में जंगली मुर्गा, मेंढक, प्राइमेट, कृंतक और सरीसृप प्रजातियों की मौजूदगी भी दर्ज की गई। यानी तेंदुआ परिस्थितियों और उपलब्धता के अनुसार अपने भोजन में ज्यादा विविधता रखता है। यही वजह है कि अध्ययन में बाघ की तुलना में तेंदुए की आहार श्रृंखला अधिक व्यापक पाई गई। ढोल के आहार में भी बाघ की तुलना में अधिक विविधता दर्ज की गई। शोध के दौरान टाइगर रिजर्व में उपलब्ध शिकार प्रजातियों की आबादी का भी आकलन किया गया। जंगली सुअर का औसत आबादी घनत्व 7.16 से 18.40 प्रति वर्ग किलोमीटर पाया गया।
इसी तरह गौर का घनत्व 7.06 से 9.11, सांभर का 2.65 से 4.55 और काकड़ का 1.98 से 3.73 प्रति वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया। बड़े शिकारी वन्यजीवों के संरक्षण के लिए जंगल में पर्याप्त शिकार उपलब्ध होना बेहद महत्वपूर्ण है। यदि प्राकृतिक शिकार की संख्या कम होती है तो इसका असर बाघ, तेंदुए और अन्य मांसाहारी जीवों के व्यवहार और उनके क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। इसी को देखते हुए सह्याद्रि टाइगर रिजर्व में शिकार आधार मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। वर्ष 2025-26 के दौरान यहां 121 चीतल और 16 सांभर छोड़े गए।
इन वन्यजीवों को छोड़ने का उद्देश्य रिजर्व में प्राकृतिक शिकार की उपलब्धता को बढ़ाना है। इससे खास तौर पर बाघ जैसे बड़े मांसाहारी वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। अध्ययन में सह्याद्रि और काली टाइगर रिजर्व के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबे गलियारे के महत्व पर भी ध्यान दिया गया है। बाघों की आवाजाही और प्रजनन के लिहाज से इस गलियारे को महत्वपूर्ण माना गया है। इस क्षेत्र में प्राकृतिक शिकार की उपलब्धता मजबूत करने की जरूरत बताई गई है। पर्याप्त शिकार होने से बड़े मांसाहारी वन्यजीवों को बेहतर आवास और भोजन उपलब्ध हो सकता है।
WII के अध्ययन से सामने आए निष्कर्ष यह समझने में मदद करते हैं कि एक ही जंगल में रहने वाले अलग-अलग बड़े शिकारी उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह करते हैं। बाघ जहां अपेक्षाकृत बड़े शिकार पर ज्यादा निर्भर दिखाई देता है, वहीं तेंदुआ भोजन के मामले में अधिक लचीला है। छोटे से लेकर मध्यम और बड़े आकार तक की कई प्रजातियां उसके आहार का हिस्सा बन सकती हैं। हालांकि तेंदुए को ‘चटोरा’ कहना वैज्ञानिक शब्द नहीं है। रिसर्च का वास्तविक निष्कर्ष यह है कि बाघ की तुलना में तेंदुए की आहार विविधता अधिक पाई गई है।
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