
देहरादून। नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद हिमालयी क्षेत्रों में बदलते पर्यावरणीय हालात को लेकर विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है। वैज्ञानिक अब इस आपदा के पीछे के कारणों का विस्तृत अध्ययन करेंगे। प्रारंभिक आकलन में सामने आया है कि उच्च हिमालयी इलाकों में बढ़ते तापमान के कारण पिछले 32 वर्षों में ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने की रफ्तार काफी तेज हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी क्षेत्र में साफ दिखाई दे रहा है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण नई हिमनदीय झीलें बन रही हैं, जिनसे भविष्य में बड़े खतरे पैदा हो सकते हैं।
ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ा खतरा
नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में लगातार वृद्धि के कारण ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं।
अध्ययनों के अनुसार, पिछले तीन दशकों में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने की गति में काफी बढ़ोतरी हुई है। करीब 32 वर्षों में कई क्षेत्रों में ग्लेशियरों की बर्फ 20 प्रतिशत तक कम होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
इस बदलाव का सीधा असर हिमालयी पर्यावरण और वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा पर पड़ रहा है।
पिथौरागढ़ में बनीं 77 से अधिक नई झीलें
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में ग्लेशियरों के पिघलने के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 77 से अधिक नई झीलें बनने की जानकारी सामने आई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इनमें से कई झीलें मलबे से भरी हुई हैं। ऐसी झीलें बेहद संवेदनशील होती हैं और किसी भी भू-गतिविधि, भूकंप या भारी बारिश के दौरान टूट सकती हैं।
यदि इन झीलों में अचानक पानी का दबाव बढ़ता है और बांध जैसी प्राकृतिक संरचना टूट जाती है तो हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ (Glacial Lake Outburst Flood-GLOF) की स्थिति पैदा हो सकती है।
गांवों और परियोजनाओं पर मंडरा रहा खतरा
हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ का सबसे ज्यादा असर निचले इलाकों में पड़ सकता है। तेज बहाव के साथ आने वाला पानी अपने साथ भारी मात्रा में मलबा भी ला सकता है।
इससे नदी किनारे बसे गांवों, कृषि भूमि, सड़कों और पुलों को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में चल रही पनबिजली परियोजनाएं भी इसकी चपेट में आ सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे खतरों को देखते हुए समय रहते निगरानी और चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
वैज्ञानिक करेंगे आपदा का अध्ययन
नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में हुई तबाही के बाद विशेषज्ञों की टीमें आपदा के कारणों का अध्ययन करेंगी। इसमें मौसम परिवर्तन, बारिश की स्थिति, ग्लेशियरों की गतिविधि और भौगोलिक बदलावों का विश्लेषण किया जाएगा।
वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करेंगे कि अचानक आई बाढ़ के पीछे कौन-कौन से प्राकृतिक और पर्यावरणीय कारण जिम्मेदार रहे।
अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते खतरे को देखते हुए आधुनिक निगरानी प्रणाली जरूरी है।
ग्लेशियरों और झीलों की लगातार निगरानी के लिए सैटेलाइट तकनीक, सेंसर आधारित सिस्टम और मौसम पूर्वानुमान तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना होगा।
समय रहते खतरे की जानकारी मिलने पर प्रशासन लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा सकता है और नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन का असर
हिमालय को दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में माना जाता है। यहां तापमान में मामूली बदलाव भी बड़े पर्यावरणीय प्रभाव पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल बाढ़ का खतरा नहीं बढ़ाता, बल्कि लंबे समय में जल संसाधनों पर भी असर डाल सकता है।
ग्लेशियर कई नदियों के प्रमुख स्रोत हैं। इनके बदलाव का असर भविष्य में पानी की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
उत्तराखंड में सतर्कता बढ़ाने की जरूरत
नेपाल आपदा के बाद उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में सतर्कता बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। राज्य सरकार पहले ही संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत करने के निर्देश दे चुकी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास कार्यों के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
भविष्य की चुनौतियों से निपटने की तैयारी
नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई आपदा ने एक बार फिर संकेत दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक बदलावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ग्लेशियरों के पिघलने और नई झीलों के बनने से भविष्य में खतरे बढ़ सकते हैं।
ऐसे में वैज्ञानिक अध्ययन, बेहतर निगरानी व्यवस्था और स्थानीय लोगों को जागरूक करना जरूरी होगा, ताकि आने वाली आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सके।





