उत्तराखंड

उत्तराखंड की 13 ग्लेशियल झीलों पर नजर

Kavita2
28 Aug 2026 10:41 AM IST
उत्तराखंड की 13 ग्लेशियल झीलों पर नजर
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देहरादून। उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे को देखते हुए राज्य सरकार ने ग्लेशियल झीलों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी है। राज्य में 13 ग्लेशियल झीलों को संवेदनशील माना गया है। इन झीलों से जुड़े संभावित खतरों को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को नियमित निगरानी और सुरक्षा उपायों को और प्रभावी बनाने के निर्देश दिए हैं।

मुख्यमंत्री धामी ने गुरुवार को राज्य आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन को इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में स्थित ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक तरीके से निगरानी करना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी संभावित खतरे का समय रहते पता लगाया जा सके और जनहानि को रोका जा सके।

13 ग्लेशियल झीलों पर विशेष नजर

उत्तराखंड हिमालयी राज्य होने के कारण प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां मौजूद ग्लेशियर और उनसे बनी झीलें पर्यावरणीय बदलावों के कारण लगातार निगरानी की मांग करती हैं।

राज्य में चिन्हित 13 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। अधिकारियों को इन झीलों की स्थिति, जलस्तर में बदलाव और संभावित जोखिमों का लगातार अध्ययन करने को कहा गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और झीलों में पानी का दबाव बढ़ने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी आपदाओं का खतरा पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में भारी नुकसान होने की आशंका रहती है।

वैज्ञानिक निगरानी पर जोर

मुख्यमंत्री धामी ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि ग्लेशियल झीलों की निगरानी केवल सामान्य निरीक्षण तक सीमित न रहे, बल्कि वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाए।

इसके तहत आधुनिक उपकरणों, सैटेलाइट डेटा, सेंसर तकनीक और अन्य वैज्ञानिक माध्यमों से झीलों की स्थिति पर नजर रखने की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि समय रहते खतरे की पहचान होने से प्रशासन को राहत और बचाव की तैयारी करने का पर्याप्त अवसर मिल सकता है।

संवेदनशील क्षेत्रों में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम

मुख्यमंत्री ने संवेदनशील क्षेत्रों में अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के निर्देश भी दिए हैं। यह प्रणाली संभावित आपदा की जानकारी पहले से उपलब्ध कराने में मदद करेगी।

अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए जलस्तर में अचानक बदलाव, मौसम संबंधी खतरे और अन्य आपदा संकेतों की जानकारी समय रहते मिल सकेगी। इससे स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीमों को तुरंत कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।

खासकर उन क्षेत्रों में जहां आबादी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा मौजूद है, वहां ऐसी प्रणालियों की स्थापना को प्राथमिकता दी जाएगी।

नेपाल बाढ़ के बाद बढ़ी सतर्कता

नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और उससे हुई तबाही के बाद हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन को लेकर चिंता बढ़ी है। इसी को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने भी अपनी तैयारियों की समीक्षा शुरू कर दी है।

उत्तराखंड और नेपाल दोनों ही हिमालयी क्षेत्र में आते हैं, जहां भौगोलिक परिस्थितियां समान हैं। ऐसे में पड़ोसी क्षेत्र में हुई आपदा से सबक लेते हुए राज्य सरकार संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में सुरक्षा उपायों को मजबूत कर रही है।

आपदा प्रबंधन को आधुनिक बनाने की पहल

उत्तराखंड में पिछले वर्षों में भूस्खलन, बादल फटने और बाढ़ जैसी कई प्राकृतिक आपदाएं सामने आ चुकी हैं। इन घटनाओं ने राज्य में बेहतर आपदा प्रबंधन व्यवस्था की जरूरत को और बढ़ाया है।

सरकार अब राहत और बचाव के साथ-साथ आपदा से पहले तैयारी पर अधिक जोर दे रही है। इसके तहत तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था विकसित की जा रही है।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा है कि आपदा प्रबंधन से जुड़े सभी विभाग आपसी समन्वय के साथ काम करें और संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

स्थानीय लोगों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता

ग्लेशियल झीलों के आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार चेतावनी प्रणाली और जागरूकता कार्यक्रमों पर भी ध्यान दे रही है।

स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में लोगों को समय-समय पर जानकारी दी जाए और आपदा की स्थिति में सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की व्यवस्था तैयार रखी जाए।

उत्तराखंड सरकार का उद्देश्य है कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को कम किया जा सके। 13 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम की स्थापना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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