उत्तराखंड

कान्हा टाइगर रिजर्व में 9 बाघों की मौत, वन विभाग अलर्ट

Rajeshwari Nishad
19 Oct 2026 11:17 PM IST
कान्हा टाइगर रिजर्व में 9 बाघों की मौत, वन विभाग अलर्ट
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देहरादून। मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) के संक्रमण से बाघों की मौत के मामले सामने आने के बाद उत्तराखंड का वन विभाग भी सतर्क हो गया है। वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा माने जाने वाले इस वायरस को लेकर राज्य में एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि, उत्तराखंड में फिलहाल बाघों में सीडीवी संक्रमण का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है, लेकिन मध्य प्रदेश की घटनाओं ने वन्यजीव संरक्षण से जुड़े अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है।
कान्हा टाइगर रिजर्व में हाल के महीनों में कई बाघों की मौत के मामले सामने आए हैं। सात अक्टूबर को सीडीवी जैसे लक्षणों से पीड़ित एक तीन वर्षीय बाघिन की उपचार के दौरान मौत हो गई थी। इसके बाद 18 अक्टूबर को मुक्की परिक्षेत्र के वन्यजीव उपचार केंद्र में भर्ती एक मादा बाघ शावक ने भी दम तोड़ दिया। हालांकि, इस शावक की मौत का कारण स्पष्ट करने के लिए प्रयोगशाला जांच की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
उत्तराखंड के टाइगर रिजर्व में बढ़ी सतर्कता
उत्तराखंड देश के प्रमुख बाघ संरक्षण वाले राज्यों में शामिल है। यहां कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और राजाजी टाइगर रिजर्व जैसे महत्वपूर्ण संरक्षित वन क्षेत्र मौजूद हैं। इन जंगलों में बाघों के अलावा तेंदुए और कई अन्य मांसाहारी वन्यजीव पाए जाते हैं।
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस के संभावित खतरे को देखते हुए वन्यजीवों की स्वास्थ्य निगरानी विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गई है। किसी भी बाघ या अन्य मांसाहारी वन्यजीव में असामान्य व्यवहार, कमजोरी या बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सकीय परीक्षण से संक्रमण का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की संक्रामक बीमारी की रोकथाम के लिए शुरुआती पहचान और समय पर उपचार संबंधी कार्रवाई बेहद जरूरी होती है।
क्या है कैनाइन डिस्टेंपर वायरस?
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस एक अत्यंत संक्रामक विषाणु है, जो मुख्य रूप से कुत्तों और अन्य मांसाहारी स्तनधारी जीवों को प्रभावित करता है। यह वायरस जानवरों के श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है।
संक्रमित जानवरों में बुखार, नाक और आंखों से पानी आना, खांसी, कमजोरी, भोजन में अरुचि और असामान्य व्यवहार जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर संक्रमण की स्थिति में मांसपेशियों में झटके, संतुलन बिगड़ना और दौरे पड़ने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
बाघ जैसे बड़े मांसाहारी वन्यजीवों में यह संक्रमण गंभीर हो सकता है। कैनाइन डिस्टेंपर के कारण कई बार संक्रमित जानवर की मृत्यु भी हो सकती है। यही वजह है कि वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ इस वायरस को बड़ी चुनौती मानते हैं।
आवारा कुत्तों से फैल सकता है संक्रमण
विशेषज्ञों के मुताबिक, कैनाइन डिस्टेंपर वायरस के प्रसार में संक्रमित घरेलू और आवारा कुत्तों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। जंगलों के आसपास रहने वाले कुत्ते यदि संक्रमित हों और वन्यजीवों के संपर्क में आएं, तो संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है।
यही कारण है कि टाइगर रिजर्व से सटे गांवों में कुत्तों के टीकाकरण को संक्रमण रोकने की महत्वपूर्ण रणनीति माना जाता है। मध्य प्रदेश में कान्हा टाइगर रिजर्व के आसपास भी इस वायरस से बचाव के लिए कुत्तों का टीकाकरण कराया गया है।
उत्तराखंड में भी जंगलों से सटे गांवों में पशुओं की स्वास्थ्य निगरानी, संदिग्ध जानवरों की पहचान और जरूरत पड़ने पर टीकाकरण जैसे उपाय संक्रमण रोकने में उपयोगी हो सकते हैं।कॉर्बेट और राजाजी में विशेष सावधानी जरूरीकॉर्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व उत्तराखंड की वन्यजीव विविधता के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। यहां बाघों के संरक्षण के लिए नियमित गश्त, कैमरा ट्रैप और वैज्ञानिक निगरानी की व्यवस्था है।
सीडीवी जैसे संक्रमण का खतरा सामने आने पर इन व्यवस्थाओं के साथ वन्यजीवों की स्वास्थ्य निगरानी को और मजबूत करना जरूरी है। विशेष रूप से जंगलों की सीमाओं और आबादी वाले क्षेत्रों में बीमारी के संकेतों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी संक्रमित जानवर की समय पर पहचान नहीं होने से बीमारी दूसरे संवेदनशील जानवरों तक पहुंच सकती है। इसलिए संदिग्ध मामलों में नमूने लेकर प्रयोगशाला जांच कराना और आवश्यकतानुसार संक्रमित जानवर को अलग रखना उपयोगी उपाय हैं।
संक्रमण रोकना वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती बीमारी को जंगलों में फैलने से रोकना है। खुले जंगलों में रहने वाले बाघों की नियमित चिकित्सकीय जांच करना आसान नहीं होता।ऐसे में वनकर्मियों की सतर्कता, कैमरा ट्रैप से प्राप्त तस्वीरें और जानवरों के व्यवहार में बदलाव की जानकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।इसके अलावा वन विभाग, पशुपालन विभाग और वन्यजीव चिकित्सकों के बीच समन्वय भी आवश्यक है। इससे संदिग्ध संक्रमण की स्थिति में तेजी से कार्रवाई संभव हो सकेगी।
उत्तराखंड में अब तक संक्रमण की पुष्टि नहीं
राहत की बात यह है कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार उत्तराखंड में अभी तक बाघों में सीडीवी संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि, इसे लेकर सतर्कता बनाए रखना जरूरी है।कान्हा टाइगर रिजर्व की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि वन्यजीव संरक्षण में संक्रामक बीमारियों की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी अवैध शिकार और प्राकृतिक आवास की सुरक्षा।
फिलहाल उत्तराखंड में उठाए जा रहे विशिष्ट एहतियाती उपायों की आधिकारिक विस्तृत सूची की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते निगरानी और संक्रमण रोकथाम से बाघों सहित अन्य वन्यजीवों को संभावित खतरे से बचाने में मदद मिल सकती है।
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