उत्तर प्रदेश

चुनावी टिकट स्टिंग केस में CBI जांच से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

Rajeshwari Nishad
13 Oct 2026 10:45 PM IST
चुनावी टिकट स्टिंग केस में CBI जांच से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
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नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के कुछ राजनीतिक दलों पर चुनावी टिकट बेचने के आरोपों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने कथित स्टिंग ऑपरेशन की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता संगठन स्वराज वाहिनी एसोसिएशन को चुनाव आयोग के समक्ष अपनी लंबित शिकायत और स्मरण पत्र को दोबारा आगे बढ़ाने की अनुमति दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संगठन अपनी शिकायत के समाधान के लिए निर्वाचन आयोग के समक्ष जा सकता है।
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। याचिका में आरोप लगाया गया था कि उत्तर प्रदेश के कुछ गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के कामकाज और चुनावी टिकटों के कथित लेनदेन से जुड़े स्टिंग ऑपरेशन सोशल मीडिया पर सामने आए थे। याचिकाकर्ता संगठन चाहता था कि इन आरोपों की जांच सीबीआई या किसी अन्य जांच एजेंसी से कराई जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच का आदेश देने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ता संगठन की मांग पर विचार करते हुए सीधे सीबीआई जांच कराने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायत लेकर चुनाव आयोग के पास जा सकता है।
पीठ ने इस बात का उल्लेख किया कि इसी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले भी जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर चुका है।इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी तत्काल जांच का आदेश देने के बजाय शिकायत के निस्तारण के लिए निर्वाचन आयोग का रास्ता अपनाने की छूट दी।
इस निर्णय का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने राजनीतिक दलों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही या गलत घोषित कर दिया है। अदालत ने केवल इस स्तर पर सीबीआई जांच के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया।
चुनाव आयोग पर जताया भरोसा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की भूमिका को महत्वपूर्ण माना।पीठ ने अपने आदेश में कहा कि उसे इस बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि चुनाव आयोग शिकायतों के समाधान के लिए प्रयास नहीं करेगा।
अदालत ने स्वराज वाहिनी एसोसिएशन को चुनाव आयोग के सामने पहले से लंबित प्रतिवेदन और स्मरण पत्र को दोबारा आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता प्रदान की।अब याचिकाकर्ता संगठन अपनी शिकायत पर कार्रवाई के लिए निर्वाचन आयोग से संपर्क कर सकता है।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को सीबीआई जांच कराने का कोई निर्देश नहीं दिया है।क्या था चुनावी टिकट बेचने का आरोप?याचिका में उत्तर प्रदेश के कुछ राजनीतिक दलों द्वारा कथित तौर पर चुनावी टिकट बेचे जाने का मुद्दा उठाया गया था।
संगठन का दावा था कि सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ स्टिंग ऑपरेशन में राजनीतिक दलों के कामकाज और उम्मीदवारों को चुनावी टिकट दिए जाने से जुड़ी कथित अनियमितताओं का संकेत मिलता है।इन्हीं रिकॉर्डिंग के आधार पर याचिकाकर्ता ने स्वतंत्र जांच की मांग की थी।हालांकि, संबंधित स्टिंग ऑपरेशन में लगाए गए आरोपों की सत्यता किसी न्यायिक फैसले में स्थापित होने की पुष्टि नहीं हुई है।इसलिए इन आरोपों को सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
कई राजनीतिक दलों को बनाया गया पक्षकार
याचिका में चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा उत्तर प्रदेश के कई राजनीतिक दलों को भी पक्षकार बनाया गया था।इनमें निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल (सोनेलाल) और जन जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) का नाम शामिल है।इन दलों का याचिका में पक्षकार होना अपने आप में किसी तरह की अनियमितता या अपराध सिद्ध नहीं करता।याचिका में लगाए गए आरोपों की जांच और उनके संबंध में किसी अंतिम निष्कर्ष के लिए विधिसम्मत प्रक्रिया आवश्यक होगी।इलाहाबाद हाईकोर्ट से भी नहीं मिली थी राहतसुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले स्वराज वाहिनी एसोसिएशन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी जनहित याचिका दाखिल की थी।
इसमें सोशल मीडिया पर प्रसारित कथित स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर सीबीआई या अन्य जांच एजेंसी से जांच कराने का अनुरोध किया गया था।सात सितंबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था।उस समय हाईकोर्ट की खंडपीठ में मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र शामिल थे।
अदालत ने कहा था कि जनहित के नाम पर सामने आने वाले प्रत्येक स्टिंग ऑपरेशन या सोशल मीडिया रिपोर्ट की जांच कराने का निर्देश न्यायालय से देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सोशल मीडिया पर वायरल स्टिंग का मामला
इस पूरे विवाद की शुरुआत कथित स्टिंग ऑपरेशन से जुड़े वीडियो और सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री को लेकर हुई थी।याचिकाकर्ता संगठन का कहना था कि इन वीडियो में चुनावी टिकटों के आवंटन से संबंधित गंभीर आरोप सामने आते हैं।इसी आधार पर संगठन ने मामले में जांच एजेंसी की भूमिका सुनिश्चित करने की मांग की।हालांकि, अदालत के सामने किसी वीडियो का प्रस्तुत होना और उसमें लगाए गए आरोपों का प्रमाणित होना दो अलग बातें हैं।ऐसी सामग्री की सत्यता, संदर्भ और उससे संबंधित तथ्यों का उचित जांच प्रक्रिया में परीक्षण किया जाना आवश्यक होता है।
चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवालराजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों को टिकट देने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।किसी चुनाव में उम्मीदवार चुनते समय राजनीतिक दल अपनी संगठनात्मक प्रक्रिया और अन्य निर्धारित नियमों के अनुसार निर्णय लेते हैं।
लेकिन यदि टिकट आवंटन में अवैध लेनदेन या किसी अन्य कानून के उल्लंघन का आरोप सामने आता है, तो उसकी जांच संबंधित प्रावधानों के आधार पर की जा सकती है।इस मामले में भी याचिकाकर्ता संगठन ने चुनावी टिकटों के कथित सौदे को जांच का आधार बनाया था।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम निर्णय देने के बजाय शिकायत निर्वाचन आयोग के समक्ष आगे बढ़ाने की छूट दी।अब चुनाव आयोग के पास जा सकेगा संगठन
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्वराज वाहिनी एसोसिएशन के लिए चुनाव आयोग के समक्ष अपनी लंबित शिकायत को आगे बढ़ाने का रास्ता खुला है।संगठन आयोग से अपने प्रतिवेदन पर विचार करने और आवश्यक कार्रवाई की मांग कर सकता है।चुनाव आयोग उपलब्ध शिकायत, प्रस्तुत दस्तावेजों और अपने वैधानिक अधिकारों के अनुसार मामले पर विचार कर सकता है।हालांकि, आयोग इस मामले में कब और क्या निर्णय लेगा, इसकी कोई निश्चित जानकारी सामने नहीं आई है।
आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को कथित टिकट बिक्री के आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।शीर्ष अदालत ने सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार किया है, लेकिन आरोपों की सत्यता का निर्धारण नहीं किया।इसलिए संबंधित राजनीतिक दलों के खिलाफ लगाए गए आरोप फिलहाल आरोप ही हैं।किसी भी संभावित कार्रवाई के लिए संबंधित संस्थाओं को उपलब्ध साक्ष्यों, कानूनी प्रावधानों और पक्षकारों के जवाबों का परीक्षण करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आगे क्या?
उत्तर प्रदेश के कुछ राजनीतिक दलों पर चुनावी टिकट बेचने के आरोपों से जुड़ा यह मामला अब एक बार फिर चुनाव आयोग के समक्ष उठाया जा सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता संगठन को यही रास्ता अपनाने की छूट दी है।इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट भी कथित स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर जांच का निर्देश देने से इनकार कर चुका था।
अब स्वराज वाहिनी एसोसिएशन निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी लंबित शिकायत को आगे बढ़ा सकता है। आयोग की ओर से होने वाली किसी भी कार्रवाई के बाद ही मामले में अगली कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
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