उत्तर प्रदेश

स्कूली वाहनों की होगी सख्त जांच, यूपी के हर जिले में खुलेंगे तीन फिटनेस सेंटर

Ratna Netam
5 Aug 2026 9:15 PM IST
स्कूली वाहनों की होगी सख्त जांच, यूपी के हर जिले में खुलेंगे तीन फिटनेस सेंटर
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लखनऊ : उत्तर प्रदेश में स्कूली बच्चों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने प्रदेश के प्रत्येक जिले में तीन-तीन आधुनिक वाहन फिटनेस जांच केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया है। इस पहल का उद्देश्य स्कूल बसों और अन्य विद्यालयी वाहनों की नियमित एवं पारदर्शी फिटनेस जांच सुनिश्चित करना है, ताकि विद्यार्थियों की सुरक्षा से किसी भी स्तर पर समझौता न हो। इस संबंध में बुधवार को विधान परिषद में परिवहन राज्यमंत्री दयाशंकर सिंह ने सरकार की योजना की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि स्कूली वाहनों की फिटनेस जांच में किसी भी प्रकार की ढील देना संभव नहीं है, क्योंकि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देश लागू हैं।
विधान परिषद के प्रश्नकाल के दौरान समाजवादी पार्टी के सदस्य आशुतोष सिन्हा ने विद्यालयी बसों और स्कूल वाहनों की फिटनेस जांच तथा उनकी अधिकतम आयु सीमा का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वर्तमान नियमों के अनुसार विद्यालयी बसों की अधिकतम आयु 15 वर्ष निर्धारित है, जबकि ऐसे वाहन सामान्य यात्री बसों की तुलना में प्रतिदिन बहुत कम समय तक चलते हैं। अधिकांश स्कूल बसें केवल विद्यार्थियों को लाने और छोड़ने के लिए औसतन दो घंटे ही संचालित होती हैं तथा पूरे वर्ष भी सीमित कार्य दिवसों में ही उपयोग होती हैं। ऐसे में यदि वाहन का रखरखाव बेहतर हो और वह नियमित फिटनेस परीक्षण में सफल हो रहा हो, तो उसकी आयु सीमा बढ़ाने पर सरकार को विचार करना चाहिए। उनका तर्क था कि इससे विद्यालयों और अभिभावकों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी कम होगा।
इस पर परिवहन राज्यमंत्री दयाशंकर सिंह ने स्पष्ट जवाब देते हुए कहा कि सरकार फिलहाल विद्यालयी वाहनों की निर्धारित आयु सीमा में कोई बदलाव करने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने बताया कि वर्तमान व्यवस्था के अनुसार शैक्षणिक संस्थानों की बसों की अधिकतम आयु 15 वर्ष तथा निजी विद्यालय बसों और स्कूल वैन की अधिकतम आयु 10 वर्ष निर्धारित है। यह व्यवस्था सड़क सुरक्षा, वाहन की यांत्रिक स्थिति और विद्यार्थियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है।
राज्यमंत्री ने कहा कि किसी भी वाहन की फिटनेस केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह बच्चों की सुरक्षा से सीधे जुड़ा विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्कूल वाहनों की फिटनेस जांच को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनका पालन करना राज्य सरकार के लिए अनिवार्य है। इसलिए फिटनेस जांच में किसी भी प्रकार की छूट या नियमों में ढील देना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि पुराने वाहनों की आयु सीमा बढ़ा दी जाती है तो इससे सड़क सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ सकती है।
सरकार की नई योजना के तहत प्रदेश के सभी जिलों में तीन-तीन फिटनेस जांच केंद्र स्थापित किए जाएंगे। इन केंद्रों पर आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से वाहनों की तकनीकी जांच की जाएगी। इससे फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनेगी। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से न केवल स्कूली वाहनों की निगरानी बेहतर होगी, बल्कि अन्य व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस जांच भी समयबद्ध तरीके से हो सकेगी।
चर्चा के दौरान भाजपा और शिक्षक दल के कई सदस्यों ने भी इस विषय पर अपने विचार रखे। भाजपा सदस्य उमेश द्विवेदी, हरी सिंह ढिल्लो और देवेंद्र प्रताप सिंह के साथ शिक्षक दल के ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने कहा कि यदि कोई विद्यालयी वाहन नियमित रूप से फिटनेस जांच में सफल हो रहा है और उसकी तकनीकी स्थिति पूरी तरह सुरक्षित है, तो केवल आयु के आधार पर उसे संचालन से बाहर करना पुनर्विचार योग्य विषय हो सकता है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
राज्यमंत्री ने यह भी कहा कि सरकार की प्राथमिकता विद्यार्थियों की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करना है। इसी उद्देश्य से स्कूल वाहनों की नियमित फिटनेस जांच, निर्धारित आयु सीमा का पालन और आधुनिक फिटनेस जांच केंद्रों की स्थापना जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। उनका कहना था कि सरकार सड़क सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और भविष्य में भी बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सभी आवश्यक कदम उठाए जाते रहेंगे।
सरकार के इस फैसले को प्रदेश में स्कूली परिवहन व्यवस्था को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक फिटनेस जांच केंद्रों के शुरू होने से वाहनों की तकनीकी खामियों का समय रहते पता लगाया जा सकेगा, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना कम होगी और लाखों विद्यार्थियों की यात्रा पहले से अधिक सुरक्षित बन सकेगी।
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