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मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में तैनात विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट/अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, त्वरित न्यायालय कोर्ट संख्या-3 **रवि कुमार दिवाकर** ने अपनी और परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। ज्ञानवापी मामले की सुनवाई कर चुके जज दिवाकर ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को पत्र भेजकर अपनी सुरक्षा में तैनात गनर को बिना उनकी सहमति और पूर्व सूचना के बदलने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए आवश्यक कार्रवाई की मांग की है।
जज रवि कुमार दिवाकर पिछले कुछ समय से अपने फैसलों को लेकर चर्चा में रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मुजफ्फरनगर में पांच महीने के कार्यकाल के दौरान उन्होंने विभिन्न मामलों में **22 दोषियों को मृत्युदंड** सुनाया है। ऐसे में उन्होंने अपनी सुरक्षा व्यवस्था में अचानक हुए बदलाव को लेकर चिंता जाहिर की है।
बिना सहमति गनर बदलने पर सवाल
जज दिवाकर ने DGP को भेजे पत्र में कहा है कि उनकी सुरक्षा में तैनात कांस्टेबल **रविंद्र सिंह ठकुरैला** को 4 जुलाई को बदल दिया गया था। उनका आरोप है कि प्रतिसार निरीक्षक मुजफ्फरनगर उदल सिंह ने बिना किसी कारण बताए और बिना उनकी सहमति के यह बदलाव किया।
न्यायिक अधिकारी ने सवाल उठाया है कि सामान्य तौर पर किसी अधिकारी की सुरक्षा में तैनात गनर को उसकी सहमति या जानकारी के बिना क्यों बदला गया। उन्होंने आशंका जताई कि इस तरह के बदलाव से उनकी सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
जज और परिवार को मिली हुई है सुरक्षा
रवि कुमार दिवाकर को शासनादेश और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पत्र के आधार पर सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है। रिपोर्ट के अनुसार उनकी और परिवार की सुरक्षा के लिए आवासीय गारद के साथ सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं।
ऐसे में जज ने गनर बदलने की प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए उच्च पुलिस अधिकारियों का ध्यान इस ओर खींचा है। उन्होंने पत्र में कहा कि उनकी सुरक्षा से संबंधित निर्णयों में गंभीरता बरती जानी चाहिए।
पांच महीने में 22 दोषियों को मृत्युदंड
रवि कुमार दिवाकर अपने न्यायिक फैसलों को लेकर भी सुर्खियों में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मुजफ्फरनगर में तैनाती के पांच महीने के भीतर उन्होंने 22 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। ये सजाएं अलग-अलग आपराधिक मामलों में सुनाई गई हैं।
इतनी बड़ी संख्या में मृत्युदंड के फैसलों के कारण उनकी सुरक्षा को लेकर संवेदनशीलता और बढ़ जाती है। जज ने भी इसी संदर्भ में अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर की है।
हालांकि ट्रायल कोर्ट से सुनाई गई मृत्युदंड की सजा अंतिम रूप से तत्काल लागू नहीं होती। कानून के तहत ऐसे मामलों में हाईकोर्ट से पुष्टि और आगे अपील की न्यायिक प्रक्रिया होती है।
ज्ञानवापी मामले की कर चुके हैं सुनवाई
जज रवि कुमार दिवाकर का नाम इससे पहले वाराणसी के चर्चित **ज्ञानवापी प्रकरण** की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। उस दौरान वह वाराणसी में सिविल जज सीनियर डिवीजन के पद पर तैनात थे।
ज्ञानवापी परिसर से जुड़े मामले में उनके आदेशों ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। इसके बाद उनकी सुरक्षा को लेकर भी चिंता सामने आई थी। अब मुजफ्फरनगर में तैनाती के दौरान एक बार फिर उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उच्च अधिकारियों को पत्र लिखा है।
सुरक्षा में लापरवाही की जताई आशंका
जज दिवाकर ने अपने पत्र में गनर बदलने को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानने के बजाय इससे पैदा हुई सुरक्षा संबंधी चिंता को प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने आशंका जताई कि सुरक्षा में जानबूझकर लापरवाही की स्थिति गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
उनकी शिकायत के बाद अब नजर पुलिस विभाग के अगले कदम पर रहेगी। यह देखना होगा कि गनर बदलने के पीछे क्या प्रशासनिक कारण था और जज द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर क्या कार्रवाई होती है।
सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की मांग
न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा का मामला संवेदनशील माना जाता है, खासकर तब जब वे गंभीर अपराधों, संगठित अपराध या अत्यधिक चर्चित मामलों की सुनवाई कर रहे हों। ऐसे मामलों में किसी भी सुरक्षा बदलाव को निर्धारित प्रक्रिया के तहत किए जाने की अपेक्षा रहती है।
रवि कुमार दिवाकर ने इसी आधार पर अपनी सुरक्षा को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की है। फिलहाल उनके पत्र में लगाए गए आरोपों पर संबंधित पुलिस अधिकारियों का विस्तृत पक्ष सामने आने की प्रतीक्षा है।
पांच महीने में 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाने और इससे पहले ज्ञानवापी जैसे चर्चित मामले की सुनवाई करने के कारण जज दिवाकर की सुरक्षा का मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है। अब यह मामला पुलिस प्रशासन तक पहुंच चुका है और सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव के कारणों तथा उनकी शिकायत पर होने वाली कार्रवाई पर नजर रहेगी।
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