- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- UP में नौकरी पर सियासत...
उत्तर प्रदेश
UP में नौकरी पर सियासत तेज अखिलेश बोले आउटसोर्सिंग करेंगे खत्म
Ratna Netam
10 Sept 2026 7:35 PM IST

x
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले रोजगार और सरकारी नौकरियों का मुद्दा तेजी से राजनीतिक बहस के केंद्र में आ रहा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री **अखिलेश यादव** ने आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर बड़ा चुनावी वादा किया है। अखिलेश ने कहा है कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर आउटसोर्सिंग की व्यवस्था खत्म की जाएगी और नियमित तथा पक्की नौकरियां देने पर जोर होगा। हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी ने भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए खुद को नियमित रोजगार की पक्षधर बताया है।
अखिलेश यादव लंबे समय से सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग के जरिए होने वाली नियुक्तियों का विरोध करते रहे हैं। उनका आरोप है कि इस व्यवस्था में कर्मचारियों को नियमित सरकारी कर्मचारियों जैसी नौकरी की सुरक्षा और दूसरे अधिकार नहीं मिलते। हालांकि इस राजनीतिक बहस का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। योगी सरकार ने आउटसोर्सिंग खत्म करने के बजाय इसे व्यवस्थित करने के लिए **उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (UPCOS)** का ढांचा तैयार किया है, जिसके जरिए समय पर वेतन, EPF, ESI, आरक्षण और कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा जैसे प्रावधान लागू किए जा रहे हैं।
सरकार बनी तो आउटसोर्सिंग खत्म करने का वादा
अखिलेश यादव का दावा है कि समाजवादी पार्टी सत्ता में लौटती है तो सरकारी नौकरियों में आउटसोर्सिंग पर निर्भरता खत्म की जाएगी। उनका कहना है कि युवाओं को ऐसी नौकरी मिलनी चाहिए जिसमें भविष्य की सुरक्षा हो और कर्मचारियों को अपने अधिकारों के लिए निजी एजेंसियों पर निर्भर न रहना पड़े।
अगस्त में सामने आए उनके एक बयान में उन्होंने साफ कहा था कि सपा सरकार बनने पर आउटसोर्सिंग खत्म कर पक्की नौकरी दी जाएगी। इसी राजनीतिक लाइन को समाजवादी पार्टी ने सितंबर में भी दोहराया और कहा कि वह नियमित तथा स्थायी नौकरियों की पक्षधर है।
यह घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश के सरकारी विभागों, अस्पतालों, स्थानीय निकायों और दूसरी संस्थाओं में बड़ी संख्या में कर्मचारी आउटसोर्स व्यवस्था के तहत सेवाएं दे रहे हैं।
आउटसोर्सिंग को लेकर क्यों है विवाद?
आउटसोर्सिंग व्यवस्था में कर्मचारी सीधे संबंधित सरकारी विभाग का नियमित कर्मचारी नहीं होता। उसकी नियुक्ति आम तौर पर किसी एजेंसी के माध्यम से होती है।
यही इस व्यवस्था को लेकर सबसे बड़ी राजनीतिक बहस है।
विपक्ष का कहना है कि अगर किसी विभाग में लंबे समय तक कर्मचारी की जरूरत है तो वहां नियमित पदों पर भर्ती की जानी चाहिए। इससे कर्मचारी को वेतन के साथ नौकरी की सुरक्षा, पदोन्नति और सेवा संबंधी दूसरे लाभ भी मिल सकेंगे।
अखिलेश यादव इसी मुद्दे को युवाओं और कर्मचारियों के बीच ले जा रहे हैं।
उन्होंने पहले भी कहा है कि आउटसोर्सिंग व्यवस्था पक्की नौकरी का अधिकार नहीं देती और उनकी सरकार बनने पर इसे खत्म किया जाएगा।
सपा ने बनाया चुनावी मुद्दा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं।
समाजवादी पार्टी रोजगार, महंगाई, आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार पर लगातार हमला कर रही है। आउटसोर्सिंग को भी पार्टी ने अब इसी रणनीति का बड़ा हिस्सा बना लिया है।
सपा मीडिया सेल की ओर से 2 सितंबर को भी कहा गया कि पार्टी आउटसोर्सिंग की विरोधी और नियमित-पक्की नौकरियों की पक्षधर है। पार्टी का दावा है कि सत्ता में आने पर सभी पदों पर नियमित भर्ती की दिशा में काम किया जाएगा।
यानी अखिलेश का वादा केवल किसी एक सभा का बयान नहीं रह गया है बल्कि सपा इसे चुनावी रोजगार नीति के महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में पेश कर रही है।
आरक्षण को लेकर भी भाजपा पर हमला
अखिलेश यादव ने आउटसोर्सिंग को आरक्षण के मुद्दे से भी जोड़ा है।
सपा की तरफ से आरोप लगाए जाते रहे हैं कि आउटसोर्सिंग के जरिए भर्ती होने पर पारंपरिक सरकारी भर्ती जैसी आरक्षण व्यवस्था कमजोर होती है। अखिलेश इसे PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति से भी जोड़ते रहे हैं।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है।
उत्तर प्रदेश की मौजूदा नई आउटसोर्सिंग व्यवस्था में आरक्षण का स्पष्ट प्रावधान रखा गया है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक SC के लिए 21 प्रतिशत, ST के लिए 2 प्रतिशत, OBC के लिए 27 प्रतिशत और EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। इसलिए यह कहना कि वर्तमान नई व्यवस्था में आरक्षण का कोई प्रावधान ही नहीं है, सही नहीं होगा। ([factgiri][4])
योगी सरकार ने बनाया UPCOS
दिलचस्प बात यह है कि जिस आउटसोर्सिंग व्यवस्था को अखिलेश खत्म करने की बात कर रहे हैं, योगी सरकार उसी व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए नया संस्थागत ढांचा लेकर आई है।
उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम यानी **UPCOS** का उद्देश्य विभिन्न सरकारी विभागों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती, तैनाती, उपस्थिति, वेतन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रिया को एकीकृत और डिजिटल बनाना है।
निगम के आधिकारिक पोर्टल के मुताबिक इसका उद्देश्य कर्मचारियों को समय पर वेतन, EPF और ESI जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराना तथा एजेंसियों और विभागों के बीच व्यवस्था को पारदर्शी बनाना है।
यानी भाजपा और सपा के बीच अंतर अब नीति के स्तर पर साफ दिखाई दे रहा है।
योगी सरकार आउटसोर्सिंग को खत्म करने के बजाय उसकी निगरानी और कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है, जबकि अखिलेश यादव इसे समाप्त कर नियमित भर्ती की तरफ जाने का वादा कर रहे हैं।
हर महीने 5 तारीख तक वेतन
नई UPCOS व्यवस्था में कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान समय पर वेतन का है।
आधिकारिक जानकारी के मुताबिक आउटसोर्स कर्मचारियों का वेतन प्रत्येक महीने की **5 तारीख तक सीधे उनके बैंक खाते में** पहुंचाने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा EPF और ESI से जुड़े भुगतान को भी सुनिश्चित करने की बात कही गई है।
आउटसोर्स कर्मचारियों की पुरानी शिकायतों में वेतन मिलने में देरी, एजेंसियों द्वारा कटौती और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े भुगतान प्रमुख रहे हैं।
नई व्यवस्था इन्हीं समस्याओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लाई गई है।
18 से 40 हजार तक पारिश्रमिक
UPCOS की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक आउटसोर्स कर्मचारियों को अलग-अलग वेतन स्तरों में रखा गया है। सपोर्ट स्टाफ के लिए करीब **18 से 20 हजार रुपये** से लेकर विशेषज्ञ श्रेणी में न्यूनतम पारिश्रमिक **40 हजार रुपये** तक रखा गया है।
इसके साथ कर्मचारियों के लिए आकस्मिक अवकाश और पात्र महिला कर्मचारियों के लिए मातृत्व अवकाश जैसी सुविधाओं का भी उल्लेख किया गया है।
मौजूदा आउटसोर्स कर्मचारियों को नई व्यवस्था लागू होने के दौरान हटाए जाने की बात भी आधिकारिक पोर्टल ने नकार दी है।
अखिलेश के वादे का कर्मचारियों पर क्या असर?
अगर भविष्य में समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है और अखिलेश यादव अपने वादे के मुताबिक आउटसोर्सिंग व्यवस्था खत्म करते हैं तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि वर्तमान आउटसोर्स कर्मचारियों का क्या होगा।
क्या सभी मौजूदा कर्मचारियों को नियमित किया जाएगा?
क्या नियमित भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित होगी?
क्या आउटसोर्स पदों को स्थायी सरकारी पदों में बदला जाएगा?
कर्मचारियों की वरिष्ठता का क्या होगा?
इन सवालों का विस्तृत नीतिगत जवाब अभी सामने आना बाकी है।
अखिलेश का राजनीतिक संदेश फिलहाल साफ है—**आउटसोर्सिंग खत्म कर पक्की नौकरी की व्यवस्था।** लेकिन इसे लागू करने का विस्तृत रोडमैप सरकार बनने और औपचारिक नीति सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
लाखों कर्मचारियों से जुड़ा मुद्दा
उत्तर प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों का मुद्दा राजनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी कार्यालयों से लेकर अस्पतालों और स्थानीय निकायों तक बड़ी संख्या में कर्मचारी इस व्यवस्था के तहत काम करते हैं।
एक हालिया रिपोर्ट में प्रदेश में ऐसे कर्मचारियों की संख्या करीब **3.5 लाख** बताई गई है।
इसमें सफाई कर्मचारी, सुरक्षा कर्मी, वार्ड ब्वॉय, माली, रसोइया, कार्यालय सहायक और विभिन्न तकनीकी पदों पर काम करने वाले लोग शामिल हो सकते हैं।
इन कर्मचारियों के साथ उनके परिवारों को जोड़कर देखें तो यह एक बड़ा सामाजिक और चुनावी वर्ग बन जाता है।
इसी वजह से आउटसोर्सिंग का मुद्दा अब केवल रोजगार नीति का सवाल नहीं बल्कि आगामी चुनाव की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी बनता दिखाई दे रहा है।
महिलाओं के लिए भी बड़ा वादा
अखिलेश यादव रोजगार के साथ सामाजिक कल्याण योजनाओं को भी चुनावी एजेंडे में ला रहे हैं।
अगस्त में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने सपा सरकार बनने पर समाजवादी पेंशन योजना फिर शुरू करने और महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाने की बात कही। रिपोर्ट में महिलाओं को सालाना **40 हजार रुपये** देने की घोषणा का भी उल्लेख है।
इसके अलावा 300 यूनिट मुफ्त बिजली और युवाओं से जुड़े दूसरे वादों की चर्चा भी उनके चुनावी बयानों में सामने आई है।
इससे संकेत मिलता है कि सपा आगामी चुनाव में रोजगार के साथ कल्याणकारी योजनाओं का बड़ा पैकेज सामने रख सकती है।
भाजपा भी रोजगार के आंकड़ों से देगी जवाब
आउटसोर्सिंग को लेकर सपा के हमलों के बीच भाजपा की रणनीति मौजूदा व्यवस्था में कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ाने और अपनी सरकार में हुई नियमित भर्तियों को सामने रखने की है।
नई आउटसोर्स व्यवस्था के समर्थकों का तर्क है कि हर अस्थायी जरूरत के लिए नियमित पद बनाना व्यावहारिक नहीं होता, इसलिए आउटसोर्सिंग की आवश्यकता बनी रहती है। सरकार ने इसी कारण व्यवस्था खत्म करने के बजाय UPCOS के जरिए एजेंसियों की मनमानी रोकने और कर्मचारियों को बेहतर सुरक्षा देने का रास्ता चुना है।
इस मुद्दे पर आने वाले महीनों में भाजपा और सपा के बीच राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना है।
चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकती है पक्की नौकरी
उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी लंबे समय से युवाओं के बीच बड़ा मुद्दा रही है। भर्ती परीक्षाओं, रिक्त पदों, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के भविष्य को लेकर समय-समय पर राजनीतिक विवाद होते रहे हैं।
अब अखिलेश यादव ने सीधे **“आउटसोर्सिंग बनाम पक्की नौकरी”** की राजनीतिक लाइन खींच दी है।
अगर सपा इस वादे को अपने चुनावी घोषणापत्र में विस्तृत नीति के साथ शामिल करती है तो भाजपा को भी इस मुद्दे पर अपनी रणनीति और मजबूती से सामने रखनी पड़ सकती है।
फिलहाल स्थिति यह है कि योगी सरकार ने आउटसोर्सिंग को समाप्त नहीं किया है बल्कि **UPCOS के जरिए इसे ज्यादा नियंत्रित, पारदर्शी और सामाजिक सुरक्षा से जोड़ने का प्रयास किया है।** दूसरी ओर अखिलेश यादव का कहना है कि उनकी सरकार बनी तो आउटसोर्सिंग व्यवस्था ही खत्म कर दी जाएगी और नियमित तथा पक्की नौकरियों की दिशा में काम किया जाएगा।
अब 2027 के चुनाव में मतदाता किस मॉडल को प्राथमिकता देते हैं—सुधार के साथ आउटसोर्सिंग या नियमित-पक्की नौकरी का सपा का वादा—यह चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण सवाल बनने जा रहा है।
Next Story





