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Lawyer's की विधवा को मुआवजे के लिए लगानी पड़ी दौड़, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

Prayagraj प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अधिवक्ता वेलफेयर स्कीम के तहत मुआवजा देने में हो रही देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने एक दिवंगत अधिवक्ता की विधवा को मुआवजे के लिए बार-बार अदालत के चक्कर लगाने की स्थिति को गंभीर मानते हुए इसे जबरन थोपा गया मुकदमा बताया है।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने ज्योतिमा की याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश अधिवक्ता कल्याण कोष ट्रस्टी सोसाइटी के सदस्य सचिव से जवाब मांगा है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सदस्य सचिव व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि मुआवजा भुगतान में इतनी देरी क्यों हुई और कितने मामले अभी लंबित हैं।
2020 में किया था मुआवजे के लिए आवेदन
मामले के अनुसार, याची ज्योतिमा ने अपने दिवंगत पति की मृत्यु के बाद अधिवक्ता कल्याण कोष योजना के तहत मिलने वाले मुआवजे के लिए वर्ष 2020 में आवेदन किया था। लेकिन लंबे समय तक उन्हें भुगतान नहीं किया गया। मजबूर होकर उन्हें हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
अदालत के हस्तक्षेप के बाद अक्टूबर 2025 में उन्हें मुआवजे की मूल राशि का भुगतान किया गया। हालांकि, भुगतान में हुई देरी को लेकर याची ने ब्याज की मांग करते हुए दोबारा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है।
योजना के संचालन पर कोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान कोर्ट को जानकारी मिली कि अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए बनाई गई इस योजना की निगरानी महाधिवक्ता की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति करती है। इस पर अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि अधिवक्ताओं के हितों के लिए बनाई गई योजना का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है।
कोर्ट ने कहा कि एक दिवंगत अधिवक्ता की विधवा को उसका अधिकार पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। न्यायालय ने इसे एक ऐसा मुकदमा बताया, जिसे परिस्थितियों के कारण याची पर मजबूरी में थोपा गया।
दो अहम बिंदुओं पर मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता कल्याण कोष ट्रस्टी सोसाइटी के सदस्य सचिव से दो प्रमुख सवालों पर जवाब मांगा है।
पहला, ट्रस्ट के पास वर्तमान में अधिवक्ताओं की विधवाओं से जुड़े कितने मुआवजा आवेदन लंबित हैं?
दूसरा, पात्र और जरूरतमंद लोगों को फंड का वितरण करने में इतनी देरी क्यों की जा रही है?
इसके अलावा कोर्ट ने यह भी पूछा है कि ट्रस्ट की लापरवाही के कारण याची को ब्याज और भारी हर्जाना देने का आदेश क्यों न किया जाए।
27 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि अगली सुनवाई तक संतोषजनक हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो सदस्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।
मामले की अगली सुनवाई के लिए हाईकोर्ट ने 27 जुलाई की तारीख तय की है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि अधिवक्ता कल्याण कोष ट्रस्टी सोसाइटी अदालत के सवालों का क्या जवाब देती है और लंबित मामलों के निस्तारण को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं।





