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Barsana में पूरे उत्साह और उमंग के साथ उमड़ा लट्ठमार होली का रंग

बरसाना: बरसाना में विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली का रंग आज पूरे उत्साह और उमंग के साथ बिखर गया। राधारानी की नगरी में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस अनूठी परंपरा का साक्षी बनने पहुंचे। यहां बरसाना की हुरियारिनों (गोपियों) ने नंदगांव से आए हुरियारों (कृष्ण रूपी भक्तों) पर प्रेम और शरारत के साथ लाठियां बरसाईं, जबकि हुरियारे अपनी ढाल से खुद को बचाने की कोशिश करते नजर आए।
अबीर-गुलाल की रंगीन फुहारें, हंसी-ठिठोली, पारंपरिक लोकगीतों और भक्ति से सराबोर इस आयोजन ने हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह हजारों वर्षों पुरानी परंपरा राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का प्रतीक मानी जाती है।
ऐसे होती है लट्ठमार होली
नंदगांव के हुरियारे जब बरसाना की पीली पोखर पहुंचते हैं, तो उनका स्वागत ठंडाई और भांग से किया जाता है। इसके बाद वे रंगीली गली जाते हैं, जहां बरसाना की गोपियां पारंपरिक होली गीतों से उन्हें रिझाने की कोशिश करती हैं। इसके बाद हंसी-मजाक, नृत्य-संगीत और उत्साह के बीच लट्ठमार होली का मुख्य आयोजन शुरू होता है।
हुरियारे ढाल लेकर आते हैं, और हुरियारिनें उन पर लाठियां बरसाकर होली खेलती हैं। इस पूरे आयोजन में श्रृंगार, प्रेम और भक्ति की अद्भुत झलक देखने को मिलती है।
40 दिन तक चलता है ब्रज में होली उत्सव
लट्ठमार होली को देखने के लिए देशभर से हजारों श्रद्धालु पहुंचे, जिनमें बुजुर्ग, युवा और बच्चे सभी शामिल थे। श्रद्धालुओं का मानना है कि यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम की अनूठी झलक है।
मान्यता है कि इस अलौकिक होली को देखने के लिए स्वयं देवता भी ब्रज में आते हैं।
ब्रज में होली केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि पूरे 40 दिन तक इसका उल्लास बना रहता है। जब तक बरसाना की हुरियारिनें नंदगांव के हुरियारों पर लाठियों से होली नहीं खेलतीं, तब तक यह उत्सव अधूरा माना जाता है।
रंगों और भक्ति की इस अद्भुत परंपरा ने एक बार फिर श्रद्धालुओं को प्रेम, आनंद और भक्ति से सराबोर कर दिया।





