उत्तर प्रदेश

4 जून 2024 ने बदला यूपी का सियासी गणित, सपा 37 सीटों के साथ बनी सबसे बड़ी पार्टी

Kavita2
30 Sept 2026 1:39 PM IST
4 जून 2024 ने बदला यूपी का सियासी गणित, सपा 37 सीटों के साथ बनी सबसे बड़ी पार्टी
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 4 जून 2024 की तारीख लंबे समय तक याद की जाएगी। इसी दिन 18वीं लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए थे और उत्तर प्रदेश से आए परिणामों ने चुनाव से पहले लगाए जा रहे कई अनुमानों को बदल दिया। 80 लोकसभा सीटों वाले देश के सबसे बड़े राज्य में समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई, जबकि भारतीय जनता पार्टी को 33 सीटों पर जीत मिली। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल 80 संसदीय क्षेत्र हैं।

लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के मतदान के बाद सामने आए कई एग्जिट पोल में उत्तर प्रदेश में भाजपा और उसके सहयोगियों को बड़ी बढ़त मिलने का अनुमान जताया गया था। कुछ अनुमानों में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 60 के आसपास या उससे अधिक सीटें मिलने की संभावना दिखाई गई थी। हालांकि 4 जून को मतगणना शुरू होने के बाद तस्वीर धीरे-धीरे बदलती चली गई।

नतीजे सामने आने पर समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतीं और उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक लोकसभा सीटें हासिल करने वाली पार्टी बनी। भाजपा को 33 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने भी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा और छह सीटों पर जीत दर्ज की। इस तरह विपक्षी गठबंधन ने राज्य में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को कड़ी चुनौती दी।

2019 के लोकसभा चुनाव से तुलना करें तो भाजपा के प्रदर्शन में बड़ा बदलाव दिखाई दिया। उस चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 62 लोकसभा सीटें जीती थीं। पांच साल बाद 2024 में उसकी सीटों की संख्या घटकर 33 रह गई। चुनाव आयोग के उपलब्ध सांख्यिकीय रिकॉर्ड 2019 और 2024 दोनों चुनावों के आधिकारिक परिणामों को दर्ज करते हैं।

उत्तर प्रदेश का परिणाम इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने राज्य में मजबूत चुनावी प्रदर्शन किया था। इस अवधि में पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार प्रभावी मौजूदगी बनाए रखी।

2024 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपनी उम्मीदवार चयन रणनीति और सामाजिक समीकरणों में बदलाव किया। अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने केवल अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न पिछड़े, दलित और अन्य सामाजिक समूहों से उम्मीदवार उतारने की रणनीति अपनाई।

समाजवादी पार्टी ने इस रणनीति को ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के रूप में पेश किया। पार्टी ने टिकट वितरण में गैर-यादव पिछड़े वर्ग और दलित समुदाय के उम्मीदवारों को भी पर्याप्त स्थान देने की कोशिश की। चुनाव परिणामों के बाद इस रणनीति को सपा के बेहतर प्रदर्शन से जोड़कर देखा गया, हालांकि किसी एक कारण को पूरे परिणाम के लिए जिम्मेदार ठहराना संभव नहीं है।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, जातीय-सामाजिक समीकरण, रोजगार, महंगाई, किसान मुद्दे, संविधान और आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस जैसे कई विषय अभियान का हिस्सा बने। भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र तथा राज्य सरकार की योजनाओं को प्रमुखता से सामने रखा, जबकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने रोजगार, सामाजिक न्याय तथा संविधान से जुड़े मुद्दों को अपने प्रचार में जगह दी।

समाजवादी पार्टी के लिए 2024 का परिणाम उसके पिछले कई लोकसभा चुनावों की तुलना में महत्वपूर्ण रहा। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव मैदान में उतरी थी, लेकिन पार्टी को केवल पांच सीटें मिली थीं। 2024 में अकेले सपा की सीटों की संख्या बढ़कर 37 पहुंच गई।

अखिलेश यादव ने खुद कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके साथ ही पार्टी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश, अवध, मध्य उत्तर प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया।

भाजपा के लिए सबसे अधिक चर्चा फैजाबाद लोकसभा सीट के परिणाम की हुई, जिसके अंतर्गत अयोध्या क्षेत्र आता है। यहां समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अवधेश प्रसाद ने जीत हासिल की। यह परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में रहा क्योंकि जनवरी 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद भाजपा ने इस मुद्दे को अपने चुनाव अभियान में प्रमुखता दी थी।

हालांकि चुनावी नतीजों को केवल एक मुद्दे के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं होगा। उत्तर प्रदेश जैसी बड़ी और सामाजिक रूप से विविध राजनीतिक इकाई में अलग-अलग सीटों पर मतदान का स्वरूप स्थानीय परिस्थितियों, प्रत्याशियों और सामाजिक गठजोड़ के आधार पर अलग रहा।

2024 के परिणाम ने यह भी दिखाया कि उत्तर प्रदेश में मुकाबला एक बार फिर दो बड़े राजनीतिक ध्रुवों के बीच केंद्रित हुआ। एक तरफ भाजपा और उसके सहयोगी थे, जबकि दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस का गठबंधन चुनाव मैदान में था।

समाजवादी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन के बाद अखिलेश यादव की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका भी बढ़ी। लोकसभा में सपा की 37 सीटों ने उसे देश की बड़ी विपक्षी पार्टियों में शामिल कर दिया। कांग्रेस के साथ उसके गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में विपक्ष को 2024 के चुनाव में महत्वपूर्ण बढ़त दिलाई।

भाजपा ने परिणाम के बाद अपने संगठन और चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा की। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन क्षेत्रों की पहचान करना रही, जहां 2019 की तुलना में उसका समर्थन कम हुआ।

4 जून 2024 के नतीजों ने यह स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश का मतदाता हर चुनाव में पुराने पैटर्न को दोहराए, यह जरूरी नहीं है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों तथा 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों के बाद 2024 का जनादेश अलग तस्वीर लेकर आया।

यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक चर्चा में 4 जून 2024 को एक महत्वपूर्ण चुनावी तारीख के रूप में देखा जाता है। उस दिन आए नतीजों में समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी, भाजपा 33 सीटों पर रही और चुनाव से पहले के कई अनुमान वास्तविक परिणामों से काफी अलग साबित हुए।

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