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Uttar Pradesh उत्तर प्रदेश : में पंचायत व्यवस्था को लेकर बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। Allahabad High Court ने राज्य में ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्यकाल बढ़ाने और पंचायत चुनाव टालने से जुड़े आदेशों पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने इन आदेशों को संविधान के खिलाफ बताते हुए उन पर रोक लगा दी है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने अरविंद राठौर की याचिका पर की। याचिका में राज्य सरकार के 25 और 26 मई के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनके तहत यूपी पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा 12(3-ए) का हवाला देकर पंचायत चुनाव टाल दिए गए थे और मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 243ई के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष के लिए निर्धारित है और इसे किसी भी परिस्थिति में बढ़ाया नहीं जा सकता। कोर्ट ने कहा कि समय पर चुनाव कराना संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है और सरकार किसी भी अध्यादेश या कानून के जरिए पंचायतों का कार्यकाल पांच साल से आगे नहीं बढ़ा सकती।
Allahabad High Court ने यह भी टिप्पणी की कि सरकार द्वारा जारी दोनों आदेश संविधान के प्रावधानों के विपरीत हैं, इसलिए ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट में यह भी बताया गया कि वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच पहले ही इस प्रावधान को असंवैधानिक करार दे चुकी है। उस फैसले में कहा गया था कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 243ई और 243के का उल्लंघन करती है।
अदालत ने राज्य सरकार से यह भी सवाल किया कि जब संविधान में पंचायतों का कार्यकाल स्पष्ट रूप से तय है, तो चुनाव टालने और कार्यकाल बढ़ाने जैसे आदेश किस आधार पर जारी किए गए। कोर्ट की सख्ती के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पंचायत व्यवस्था में प्रशासक के रूप में प्रधानों का कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
इस फैसले के बाद प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर नई स्थिति बन गई है और अब सरकार को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार आगे की कार्रवाई करनी होगी।





