उत्तर प्रदेश

देश का पहला बायोपॉलिमर प्लांट यूपी में शुरू

Rajeshwari Nishad
15 Oct 2026 12:24 PM IST
देश का पहला बायोपॉलिमर प्लांट यूपी में शुरू
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लखीमपुर खीरी। उत्तर प्रदेश अब हरित उद्योग और पर्यावरण-अनुकूल विनिर्माण के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में देश की पहली बड़े पैमाने की बायोपॉलिमर निर्माण सुविधा स्थापित की जा रही है। इस अत्याधुनिक प्लांट की सबसे खास बात यह है कि यहां गन्ने से पर्यावरण-अनुकूल बायोप्लास्टिक का उत्पादन किया जाएगा। करीब 3,080 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रहा यह संयंत्र प्लास्टिक उद्योग में नई संभावनाएं पैदा करने के साथ किसानों, स्थानीय युवाओं और औद्योगिक क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। संयंत्र का संचालन अक्टूबर 2026 में शुरू करने का लक्ष्य रखा गया था, हालांकि इसकी व्यावसायिक शुरुआत की अंतिम पुष्टि अभी नहीं हुई है।
लखीमपुर खीरी में बन रहा देश का पहला बड़ा बायोपॉलिमर प्लांट
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की गोला गोकर्णनाथ तहसील के कुंभी क्षेत्र में इस महत्वाकांक्षी परियोजना का निर्माण किया जा रहा है। बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड की कुंभी चीनी मिल परिसर में यह संयंत्र स्थापित हो रहा है।
इस प्लांट में स्थानीय स्तर पर उत्पादित गन्ने का इस्तेमाल करके पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए (PLA) आधारित बायोप्लास्टिक तैयार किया जाएगा। यह पारंपरिक पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक का एक जैव-आधारित विकल्प है।
परियोजना को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि गन्ने के प्रसंस्करण से लेकर बायोपॉलिमर निर्माण तक की प्रमुख प्रक्रियाएं एक ही औद्योगिक परिसर में पूरी की जा सकें।
इससे कच्चे माल के परिवहन और उत्पादन संबंधी व्यवस्थाओं में बेहतर तालमेल स्थापित होने की उम्मीद है।
हर साल 80 हजार टन बायोप्लास्टिक बनाने की क्षमता
इस अत्याधुनिक प्लांट की प्रस्तावित वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 80 हजार टन पॉलीलैक्टिक एसिड होगी। यह क्षमता भारत के जैव-आधारित प्लास्टिक उद्योग के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पीएलए का उपयोग पैकेजिंग सामग्री, खाद्य पदार्थों की पैकिंग, डिस्पोजेबल उत्पादों और विभिन्न औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण में किया जा सकता है।
पारंपरिक प्लास्टिक मुख्य रूप से पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल से तैयार होता है, जबकि पीएलए का उत्पादन नवीकरणीय कृषि संसाधनों से किया जा सकता है।
हालांकि पीएलए आधारित उत्पादों के उचित विघटन के लिए विशेष औद्योगिक कंपोस्टिंग परिस्थितियों की जरूरत हो सकती है। इसलिए इसे हर परिस्थिति में अपने आप नष्ट होने वाला प्लास्टिक नहीं समझना चाहिए।
गन्ने से कैसे तैयार होगा पर्यावरण-अनुकूल प्लास्टिक?
इस प्लांट में गन्ने से प्राप्त शर्करा को जैविक और रासायनिक प्रसंस्करण की विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजारा जाएगा।सबसे पहले गन्ने से प्राप्त शर्करा का उपयोग लैक्टिक एसिड तैयार करने में किया जा सकता है। इसके बाद तकनीकी प्रक्रियाओं के माध्यम से लैक्टिक एसिड को पॉलीलैक्टिक एसिड में बदला जाता है।पीएलए एक प्रकार का बायोपॉलिमर है, जिसे आवश्यकतानुसार विभिन्न उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है।इस तकनीक से कृषि आधारित कच्चे माल को अधिक मूल्य वाले औद्योगिक उत्पाद में परिवर्तित करने का अवसर मिलेगा।भारत जैसे कृषि प्रधान देश में इस तरह की परियोजनाएं किसानों और उद्योगों के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की क्षमता रखती हैं।
पूरी तरह नवीकरणीय ऊर्जा से चलेगा संयंत्र
इस परियोजना की प्रमुख विशेषताओं में नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल भी शामिल है। संयंत्र को पूरी तरह नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित करने की योजना बनाई गई है।इससे पारंपरिक जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में सहायता मिल सकती है।उद्योगों में ऊर्जा की जरूरत काफी अधिक होती है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल से उत्पादन की पर्यावरणीय लागत कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है।
परियोजना में ऊर्जा दक्षता और संसाधनों के बेहतर उपयोग पर विशेष जोर दिया गया है। इससे हरित विनिर्माण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।जीरो लिक्विड डिस्चार्ज तकनीक से होगा पानी का संरक्षणप्लांट में जीरो लिक्विड डिस्चार्ज यानी ZLD प्रणाली का इस्तेमाल किया जाएगा। यह तकनीक औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार और दोबारा उपयोग के लिए तैयार की जाती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संयंत्र से दूषित तरल अपशिष्ट नदियों, नालों या आसपास के जलस्रोतों में न छोड़ा जाए।अपशिष्ट जल को उपचारित करके दोबारा उत्पादन प्रक्रियाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है।इस तकनीक से पानी की खपत कम करने और औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलने की उम्मीद हैहालांकि प्रणाली की वास्तविक प्रभावशीलता संयंत्र के संचालन, रखरखाव और पर्यावरणीय मानकों के पालन पर निर्भर करेगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रखी थी आधारशिला
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 22 फरवरी 2025 को इस महत्वपूर्ण परियोजना की आधारशिला रखी थी।उस समय परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 2,850 करोड़ रुपये बताई गई थी। बाद के परियोजना विवरणों में निवेश का आंकड़ा बढ़कर लगभग 3,080 करोड़ रुपये सामने आया।मुख्यमंत्री ने इस परियोजना को प्रदेश के औद्योगिक विकास और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया था।
सरकार का उद्देश्य प्रदेश में कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर विकसित करना है।आकाशवाणी न्यूज़किसानों और स्थानीय युवाओं को मिल सकता है फायदा
लखीमपुर खीरी और आसपास के क्षेत्रों में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर बायोपॉलिमर उत्पादन शुरू होने से गन्ने की औद्योगिक उपयोगिता बढ़ सकती है।इस परियोजना से कृषि आधारित उद्योगों के विस्तार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
संयंत्र के संचालन से तकनीकी विशेषज्ञों, इंजीनियरों, कर्मचारियों और अन्य संबंधित सेवाओं में रोजगार की संभावनाएं विकसित हो सकती हैं।इसके अलावा परिवहन, रखरखाव, पैकेजिंग और औद्योगिक आपूर्ति से जुड़े व्यवसायों को भी अवसर मिल सकते हैं।हालांकि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार की अंतिम संख्या संयंत्र के वास्तविक संचालन और कारोबारी विस्तार पर निर्भर करेगी।प्लास्टिक प्रदूषण कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
दुनियाभर में प्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बना हुआ है। खासतौर पर एकल उपयोग वाले पारंपरिक प्लास्टिक उत्पादों के विकल्प तलाशने पर जोर दिया जा रहा है।
ऐसे समय में गन्ने से बायोप्लास्टिक बनाने की यह परियोजना देश के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
पीएलए जैसे जैव-आधारित पदार्थों का इस्तेमाल कुछ उत्पादों में पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक की आवश्यकता कम कर सकता है।
हालांकि बायोप्लास्टिक के पर्यावरणीय लाभों का वास्तविक आकलन उसके उत्पादन, ऊर्जा उपयोग, परिवहन और इस्तेमाल के बाद निपटान की पूरी प्रक्रिया के आधार पर किया जाना जरूरी है।
ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग में यूपी को मिलेगी नई पहचान
लखीमपुर खीरी का यह बायोपॉलिमर प्लांट उत्तर प्रदेश में हरित विनिर्माण और जैव-आधारित उद्योगों के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जा रहा है।बड़े निवेश, आधुनिक तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा और जल संरक्षण की व्यवस्थाओं के साथ यह संयंत्र प्रदेश के औद्योगिक विकास को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।इसके सफल संचालन से देश में जैव-आधारित औद्योगिक उत्पादों का निर्माण बढ़ाने और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाने के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।
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