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उत्तर प्रदेश
पति के कर्ज के लिए पत्नी की FD नहीं तोड़ सकता बैंक हाईकोर्ट का आदेश
nidhi
18 Sept 2026 8:04 AM IST

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FD पर हाईकोर्ट का अहम आदेश
लखनऊ : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) द्वारा मृतक पति के व्यक्तिगत ऋण की वसूली के लिए उसकी विधवा पत्नी की फिक्स डिपाजिट (एफडी) से 19.90 लाख रुपये डेबिट करने की कार्रवाई को गंभीरता से लिया है। न्यायालय ने बैंक को पूरी रकम एफडी की लागू ब्याज दर के साथ चार सप्ताह में वापस करने का आदेश एसबीआई को दिया है। इसके साथ ही पत्नी को एक लाख रुपये का मुआवजा भी देने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने बैंक के खिलाफ गंभीर टिप्पणी भी की और इस कार्रवाई को बैंकिंग प्रक्रिया का घृणित उल्लंघन करार दिया है।
न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह आदेश नेहा मिश्रा की याचिका स्वीकार को करते हुए दिया। उनके पति लखनऊ के रिंग रोड स्थित मेडिसिन अस्पताल में सहायक प्रोफेसर थे। उन्होंने नवंबर 2020 में एसबीआई से 15 लाख रुपये का व्यक्तिगत ऋण लिया था। कोर्ट ने पाया कि नेहा मिश्रा न तो ऋण की सह-आवेदक थीं और न ही गारंटर अथवा क्षतिपूर्तिकर्ता या नामिनी। ऋण लेनदेन में उनका बैंक के साथ कोई संविदात्मक संबंध भी नहीं था।
कोर्ट ने गुपचुप की गई कार्रवाई बताया
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि ऋण बीमा पॉलिसी से कवर था, जिसके लिए मृतक ने कथित तौर पर 8,803 रुपये प्रीमियम का भुगतान भी किया था। खंडपीठ ने इस पूरी प्रक्रिया को गुपचुप तरीके से की गई कार्रवाई बताते हुए कहा कि एसबीआई यह बताने में विफल रहा कि किस कानूनी प्रावधान के तहत वह पति के कर्ज की वसूली के लिए उसकी पत्नी के खाते से सीधे रकम काट सकता है।
कोविड से हुई थी पति की मौत
दरअसल याची के पति की मई 2021 में कोविड से मृत्यु के बाद एसबीआई ने सितंबर 2025 में नेहा मिश्रा को कानूनी नोटिस भेजकर 13.87 लाख रुपये के बकाया ऋण का भुगतान करने को कहा। इसके बाद बैंक ने उनका वेतन खाता भी रोक दिया। आरबीआई लोकपाल के हस्तक्षेप के बाद ही खाते पर लगी रोक हटाई गई।
बैंक ग्राहकों के धन के संरक्षक
हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक अपने ग्राहकों के धन के संरक्षक होते हैं और उसे ट्रस्ट के रूप में रखते हैं। यदि एसबीआई कानूनन मृतक के कर्ज की वसूली उसकी पत्नी से उत्तराधिकारी के रूप में करने का हकदार था, तब भी इसके लिए विधि सम्मत प्रक्रिया अपनानी जरूरी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी वसूली मनमाने, स्वेच्छाचारी और अनियमित तरीके से नहीं की जा सकती।
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