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उत्तर प्रदेश
अखिलेश ने बदला सपा छात्रसभा का ड्रेस कोड नीले रंग से किसे साधने की तैयारी?
Ratna Netam
7 Sept 2026 6:54 PM IST

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने संगठन और अपनी राजनीतिक पहचान में एक दिलचस्प बदलाव किया है। लाल टोपी और लाल गमछे से पहचाने जाने वाले समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता अब नीले रंग में भी नजर आएंगे। पार्टी ने अपनी छात्र इकाई **समाजवादी छात्र सभा** के कार्यकर्ताओं के लिए नया ड्रेस कोड तय किया है। इसके तहत छात्र सभा के कार्यकर्ता नीली शर्ट-नीली पैंट या नीली जींस और नीली टी-शर्ट में दिखाई देंगे।
नई टी-शर्ट पर समाजवादी छात्र सभा का लोगो और पार्टी का चुनाव चिह्न 'साइकिल' भी बना होगा। यूपी की राजनीति में नीले रंग को लंबे समय से दलित राजनीति और बहुजन आंदोलन से जोड़कर देखा जाता रहा है। ऐसे में चुनाव से पहले सपा के इस कदम के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।
लाल टोपी रहेगी, साथ जुड़ा नीला रंग
समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय से लाल रंग से जुड़ी रही है। पार्टी के कार्यक्रमों और रैलियों में नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के सिर पर लाल टोपी आम तौर पर दिखाई देती है। अखिलेश यादव भी अक्सर लाल टोपी और लाल गमछे में नजर आते हैं।
अब पार्टी ने लाल रंग को हटाने के बजाय उसके साथ नीले रंग को भी संगठनात्मक पहचान में जगह दी है। खास तौर पर छात्र सभा के लिए तय नीली ड्रेस ने राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है।
अखिलेश और शिवपाल भी दिखे थे नीले गमछे में
इस बदलाव की चर्चा इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि 31 अगस्त को लखनऊ में समाजवादी पार्टी के जिला और महानगर अध्यक्षों की बैठक में अखिलेश यादव खुद लाल की जगह **नीला गमछा** पहने दिखाई दिए थे।
उनके साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने भी नीला गमछा पहना था। इसके करीब छह दिन बाद छात्र सभा के लिए नीली ड्रेस तय किए जाने की खबर सामने आई। इन दोनों घटनाक्रमों को जोड़कर राजनीतिक हलकों में सपा की नई रणनीति को लेकर चर्चा हो रही है।
क्या दलित वोटरों पर है नजर?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग खास तौर पर बहुजन समाज पार्टी और दलित आंदोलन से जुड़ा रहा है। बसपा के झंडे का रंग भी नीला है। इसलिए सपा द्वारा छात्र सभा के लिए नीले रंग को चुनने को दलित समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि पार्टी ने इसे आधिकारिक रूप से बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति नहीं बताया है। ऐसे में इसे लेकर सामने आ रहे राजनीतिक अर्थ फिलहाल विश्लेषण और अटकलों का हिस्सा हैं।
PDA फॉर्मूले पर अखिलेश का जोर
अखिलेश यादव पिछले कुछ वर्षों से **PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक** समीकरण पर जोर देते रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीती थीं और राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी।
सपा नेतृत्व ने इस प्रदर्शन के पीछे PDA रणनीति को महत्वपूर्ण बताया था। अब पार्टी की कोशिश 2027 के विधानसभा चुनाव में इसी सामाजिक समीकरण को और व्यापक बनाने की है।
सपा का फोकस अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ दलित, अति पिछड़े और दूसरे सामाजिक वर्गों के बीच अपनी मौजूदगी बढ़ाने पर दिखाई दे रहा है।
बसपा के लिए भी चुनौती?
सपा की नीली ड्रेस की रणनीति को बसपा की राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। यूपी में दलित मतदाता लंबे समय तक बसपा का मजबूत आधार रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ चुनावों में दलित वोटों के अलग-अलग राजनीतिक दलों की ओर जाने के संकेत मिले हैं।
ऐसे में अखिलेश यादव अगर PDA के जरिए दलित मतदाताओं में अपनी पकड़ और मजबूत करते हैं तो इसका असर सपा, भाजपा और बसपा के बीच बनने वाले चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है।
भाजपा ने भी साधा निशाना
सपा नेताओं के नीले गमछे और छात्र सभा की नीली ड्रेस को लेकर भाजपा ने भी हमला बोला है। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने तंज कसते हुए कहा कि रंग बदलने से पुराने राजनीतिक दाग नहीं मिटेंगे। इससे साफ है कि रंगों की यह सियासत विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और सपा के बीच नया राजनीतिक मुद्दा भी बन सकती है।
फिलहाल समाजवादी पार्टी की लाल टोपी अपनी जगह बनी रहेगी, लेकिन छात्र सभा की नीली ड्रेस ने पार्टी की चुनावी रणनीति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है। 2027 के चुनाव में यह प्रयोग मतदाताओं पर कितना असर डालता है, इसका असली जवाब चुनावी मैदान में ही मिलेगा।
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