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प्रयागराज : हृदय रोग से पीड़ित महिला की इलाज के दौरान मौत के मामले में करीब 18 साल बाद उसके परिवार को न्याय मिला है। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, प्रयागराज ने चिकित्सकीय लापरवाही के लिए तीन डॉक्टरों को जिम्मेदार मानते हुए मृतका के पति को छह लाख रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया है। इसके साथ ही मुकदमे पर हुए खर्च के लिए अलग से 10 हजार रुपये देने का निर्देश भी दिया गया है।
आयोग ने आदेश दिया कि छह लाख रुपये की मुआवजा राशि पर मुकदमा दाखिल करने की तारीख से अंतिम भुगतान होने तक आठ प्रतिशत की दर से सामान्य वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह फैसला आयोग के अध्यक्ष मोहम्मद इब्राहीम, सदस्य प्रकाश चंद्र त्रिपाठी और सदस्य सरला की पीठ ने सुनाया।
प्रयागराज के राजरूपपुर निवासी महंत प्रकाश सिंह ने 24 जुलाई 2008 को जिला उपभोक्ता आयोग में वाद दाखिल किया था। उन्होंने अपनी पत्नी मालती सिंह के इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए डॉक्टरों से क्षतिपूर्ति दिलाने की मांग की थी। लंबी सुनवाई और उपलब्ध चिकित्सकीय अभिलेखों के परीक्षण के बाद आयोग ने अपना निर्णय दिया।
हृदय की गंभीर बीमारी से पीड़ित थीं मालती
परिवाद में बताया गया कि महंत प्रकाश सिंह की 35 वर्षीय पत्नी मालती सिंह हृदय संबंधी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। तबीयत खराब होने पर 19 नवंबर 2007 को उन्हें प्रयागराज के सिविल लाइंस स्थित हार्ट लाइन कार्डियक केयर सेंटर ले जाया गया था। वहां चिकित्सकीय परीक्षण के बाद डॉक्टरों ने बीएमटी अथवा बीएमवी प्रक्रिया कराने की सलाह दी थी।
परिवार को ऑपरेशन पर करीब 50 हजार रुपये खर्च होने की जानकारी दी गई। महंत प्रकाश सिंह ने 22 नवंबर 2007 को अस्पताल में 40 हजार रुपये जमा कर दिए। आरोप लगाया गया कि रकम जमा करने और बार-बार संपर्क किए जाने के बावजूद ऑपरेशन को कई बार टाला गया। इससे मरीज और उसके परिवार को परेशानी का सामना करना पड़ा।
फरवरी 2008 में मालती सिंह के इलाज की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इलाज के दौरान उन्हें तेज बुखार होने लगा। उनके पति ने अस्पताल के डॉक्टरों को इसकी जानकारी दी तो कथित रूप से बताया गया कि ऑपरेशन के बाद बुखार आना सामान्य है। 14 फरवरी को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, लेकिन घर जाने के बाद भी उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ।
दोबारा अस्पताल में कराया गया भर्ती
परिवाद के मुताबिक, 17 फरवरी को मालती सिंह की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। इसके बाद परिवार उन्हें दोबारा डॉक्टर के पास लेकर पहुंचा और अस्पताल में भर्ती कराया। कुछ दिनों तक उपचार के बाद 23 फरवरी को उन्हें फिर डिस्चार्ज कर दिया गया। इसके बावजूद बुखार और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं बनी रहीं।
हालत में सुधार नहीं होने पर परिवार उन्हें स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल ले गया। अभिलेखों के अनुसार वहां चिकित्सकों ने जांच के बाद बताया कि ऑपरेशन के पश्चात हृदय के वॉल्व में संक्रमण हो गया था। परिवादी का आरोप था कि जरूरी जांच पूरी किए बिना चिकित्सकीय प्रक्रिया किए जाने के कारण मरीज को संक्रमण हुआ।
हालत गंभीर होने पर 28 फरवरी 2008 को मालती सिंह को लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान रेफर किया गया। वहां कई दिनों तक उनका इलाज चला, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ। अंततः 21 मार्च 2008 को इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
इसके बाद पति ने डॉक्टरों पर उपचार में लापरवाही, आवश्यक सावधानी नहीं बरतने और मरीज की गंभीर स्थिति को समय रहते नहीं पहचानने का आरोप लगाते हुए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। करीब 18 वर्ष तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद आयोग ने डॉक्टरों को छह लाख रुपये क्षतिपूर्ति, आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज और 10 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने का आदेश दिया।
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