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काशी में अनोखी मिसाल: पालतू श्वान कल्लू की आत्मा की शांति के लिए हुआ तेरहवीं संस्कार

वाराणसी। काशी की धार्मिक परंपराओं में भगवान शिव और काल भैरव की विशेष मान्यता है। मान्यता के अनुसार भैरव की सवारी श्वान (कुत्ता) माना जाता है, इसलिए यहां कुत्तों के प्रति श्रद्धा और सेवा की भावना भी देखने को मिलती है। खासतौर पर काले कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। लेकिन जब यही श्रद्धा किसी पालतू जीव के प्रति गहरे भावनात्मक लगाव में बदल जाए और उसके निधन के बाद इंसानों की तरह संस्कार किए जाएं, तो यह अपने आप में अनोखी घटना बन जाती है।
ऐसा ही एक भावुक मामला वाराणसी के लब्लॉक क्षेत्र के नथईपुर गांव से सामने आया, जहां सोमवार को वेद प्रकाश दुबे के घर उनके पालतू श्वान कल्लू की आत्मा की शांति के लिए तेरहवीं का आयोजन किया गया। इस आयोजन ने न केवल परिवार के भावनात्मक जुड़ाव को दिखाया, बल्कि पशुओं के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता की एक मिसाल भी पेश की।
वेद प्रकाश दुबे के परिवार के लिए कल्लू केवल एक पालतू जानवर नहीं था, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह था। वर्षों तक घर की रखवाली करने वाले कल्लू के निधन के बाद परिवार ने उसकी यादों को सम्मान देने का फैसला किया। इसी भावना के साथ हिंदू परंपरा के अनुसार उसकी आत्मा की शांति के लिए तेरहवीं कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इस आयोजन की खास बात यह रही कि कल्लू कोई विदेशी नस्ल का महंगा श्वान नहीं था, बल्कि देसी नस्ल का कुत्ता था। आमतौर पर पालतू जानवरों के प्रति ऐसा भाव बड़े शहरों और विदेशी नस्ल के पशुओं के साथ ज्यादा देखने को मिलता है, लेकिन नथईपुर गांव में एक देसी श्वान के लिए इस तरह का आयोजन लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया।
तेरहवीं कार्यक्रम में परिवार के लोगों ने कल्लू को याद करते हुए उसकी वफादारी और साथ को साझा किया। ग्रामीणों के अनुसार, कल्लू लंबे समय तक परिवार के साथ रहा और घर की सुरक्षा में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह परिवार के सदस्यों के प्रति बेहद लगाव रखने वाला और वफादार श्वान था।
ग्रामीणों ने बताया कि कल्लू का व्यवहार ऐसा था कि वह केवल घर की रखवाली नहीं करता था, बल्कि परिवार के हर सदस्य के साथ उसका भावनात्मक रिश्ता बन गया था। उसके निधन से परिवार को काफी दुख पहुंचा, जिसके बाद उन्होंने उसकी आत्मा की शांति के लिए यह आयोजन करने का निर्णय लिया।
कार्यक्रम में आसपास के लोग भी शामिल हुए और कल्लू को श्रद्धांजलि दी। लोगों ने परिवार के इस भाव को सराहा और कहा कि जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना और प्रेम समाज में सकारात्मक संदेश देता है।
काशी में श्वानों को लेकर धार्मिक मान्यता भी इस घटना से जुड़ी दिखाई देती है। धार्मिक परंपराओं में भगवान काल भैरव के वाहन के रूप में श्वान का विशेष स्थान माना जाता है। इसी कारण काशी में श्वानों को भोजन कराने और उनकी सेवा करने की परंपरा भी रही है।
हालांकि, नथईपुर की यह घटना केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि इंसान और पशु के बीच बने भावनात्मक संबंध को भी दर्शाती है। पालतू जानवर अक्सर परिवार के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं और उनके जाने का दुख भी परिवार के लिए किसी प्रिय सदस्य को खोने जैसा होता है।
पशु प्रेमियों का कहना है कि ऐसे आयोजन समाज में यह संदेश देते हैं कि जानवर भी भावनाएं रखते हैं और उनके प्रति दया व सम्मान का व्यवहार जरूरी है। खासकर देसी नस्ल के पशुओं के प्रति सम्मान बढ़ाने की दिशा में भी यह घटना महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
वेद प्रकाश दुबे के परिवार ने कल्लू की यादों को संजोने के लिए जो कदम उठाया, वह गांव में चर्चा का विषय बना हुआ है। तेरहवीं संस्कार के जरिए परिवार ने अपने वफादार साथी को अंतिम सम्मान दिया और यह संदेश दिया कि प्रेम और अपनापन केवल इंसानों तक सीमित नहीं होता।
काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच सामने आई यह घटना मानवीय संवेदनाओं और पशुओं के प्रति लगाव की एक अनूठी कहानी बन गई है। कल्लू के लिए आयोजित तेरहवीं ने यह दिखाया कि एक पालतू जीव भी किसी परिवार के जीवन में कितना खास स्थान बना सकता है।





