तेलंगाना

राय: बढ़ती ताकत के बीच न्याय पर उठते सवाल

Kiran
6 Oct 2026 7:30 AM IST
राय: बढ़ती ताकत के बीच न्याय पर उठते सवाल
x

भारत का सुप्रीम कोर्ट केवल देश की सबसे बड़ी अदालत नहीं है, बल्कि संविधान की व्याख्या करने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्था भी है। समय के साथ इसकी भूमिका और दायरा लगातार बढ़ा है। सरकारों के फैसलों से लेकर चुनावी विवादों, नागरिक स्वतंत्रता, पर्यावरण, आरक्षण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही तक अनेक बड़े मुद्दे अंततः सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचते हैं। यही कारण है कि अदालत की शक्ति जितनी बढ़ती है, उसके कामकाज, गति और न्याय की वास्तविक पहुंच को लेकर सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

भारत में न्यायपालिका को संविधान ने स्वतंत्र स्थान दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले न केवल विवादों का निपटारा करते हैं, बल्कि कई बार कानून और प्रशासन की दिशा भी तय करते हैं। जनहित याचिकाओं के विस्तार ने आम नागरिकों और सामाजिक संगठनों के लिए अदालत के दरवाजे खोले। कई मामलों में न्यायपालिका ने कार्यपालिका और विधायिका को उनके संवैधानिक दायित्वों की याद दिलाई है। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट की बढ़ती भूमिका लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या अदालत की बढ़ती शक्ति के साथ न्याय की गति और उपलब्धता भी उसी अनुपात में बेहतर हुई है? न्याय का अर्थ केवल अंतिम फैसला सुनाना नहीं है। न्याय समय पर मिले, आम व्यक्ति की पहुंच में हो और प्रक्रिया इतनी लंबी न हो कि फैसला आते-आते उसका महत्व ही कम हो जाए—यह भी उतना ही जरूरी है।

लंबित मामलों की समस्या भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने वर्षों से बनी हुई है। स्वयं सुप्रीम कोर्ट भी इस चुनौती पर रिपोर्ट और अध्ययन जारी करता रहा है। अदालत की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध भारतीय न्यायपालिका की वार्षिक रिपोर्ट में न्यायिक कामकाज, उपलब्धियों और व्यवस्थागत सुधारों का विवरण दिया जाता है। नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों के दबाव से निपटने के विषय पर ‘Unclogging the Docket’ नाम से रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी। इससे यह साफ है कि लंबित मामलों का बोझ न्यायपालिका के भीतर भी गंभीर चिंता का विषय है।

न्यायाधीशों की संख्या भी इस बहस का अहम हिस्सा है। केंद्र सरकार के न्याय विभाग के 1 जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत न्यायाधीश पदों की संख्या 38 थी, जबकि उस समय 32 न्यायाधीश कार्यरत थे और छह पद खाली थे। इसी अवधि में देश के उच्च न्यायालयों में भी बड़ी संख्या में पद रिक्त थे। खाली पद, तेजी से बढ़ता मुकदमों का बोझ और सीमित न्यायिक समय मिलकर मामलों की सुनवाई को प्रभावित कर सकते हैं।

एक दूसरी चुनौती न्याय की समान पहुंच है। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना आर्थिक और भौगोलिक दृष्टि से हर नागरिक के लिए आसान नहीं है। देश के दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले लोगों को दिल्ली तक मुकदमा लड़ने में खर्च, वकीलों की फीस और समय जैसी व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। डिजिटल सुनवाई और तकनीकी सुविधाओं ने कुछ बाधाएं जरूर कम की हैं, लेकिन डिजिटल पहुंच और कानूनी सहायता की असमानता अभी भी चुनौती बनी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर बहस का एक पहलू यह भी है कि अदालत को किन मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए और किन मामलों में निर्वाचित सरकारों या संसद के लिए जगह छोड़नी चाहिए। न्यायिक सक्रियता के समर्थकों का मानना है कि जब प्रशासन या राजनीतिक संस्थाएं अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने में विफल हों, तब अदालत का हस्तक्षेप नागरिक अधिकारों की रक्षा करता है। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि अदालतों को नीति निर्माण के क्षेत्र में अत्यधिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए, क्योंकि सरकारें जनता के प्रति सीधे जवाबदेह होती हैं।

दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन ही संवैधानिक व्यवस्था की मजबूती तय करता है। सुप्रीम कोर्ट की शक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी पारदर्शिता, प्रक्रिया की निरंतरता और निर्णयों में संस्थागत भरोसा है। न्यायपालिका की विश्वसनीयता केवल बड़े फैसलों से नहीं बनती, बल्कि इस बात से भी बनती है कि सामान्य नागरिक को अदालत से किस तरह का अनुभव मिलता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि न्यायपालिका की हर समस्या का समाधान केवल सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर नहीं हो सकता। अधिकतर नागरिकों का पहला संपर्क जिला अदालतों और अधीनस्थ न्यायालयों से होता है। इसलिए जजों की नियुक्ति, अदालतों के बुनियादी ढांचे, तकनीक, कानूनी सहायता और प्रक्रियागत सुधार पूरे न्यायिक तंत्र में जरूरी हैं।

सुप्रीम कोर्ट के सामने आज चुनौती अपनी संवैधानिक शक्ति को बढ़ाने की नहीं, बल्कि उस शक्ति के साथ न्याय की गुणवत्ता और समयबद्धता सुनिश्चित करने की है। किसी लोकतंत्र में अदालत तभी वास्तव में मजबूत मानी जाएगी जब उसके फैसलों का सम्मान होने के साथ-साथ नागरिकों को यह भरोसा भी हो कि उनकी सुनवाई समय पर और निष्पक्ष तरीके से होगी।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट कितना शक्तिशाली हो गया है। बड़ा सवाल यह है कि क्या न्याय व्यवस्था की बढ़ती ताकत का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है। न्यायपालिका की सफलता का असली पैमाना अदालत की शक्ति नहीं, बल्कि नागरिक को मिलने वाला समय पर, निष्पक्ष और सुलभ न्याय होना चाहिए।


Next Story