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हैदराबाद: हैदराबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (ICMR-NIN) के शोधकर्ताओं के एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि माताओं की जानकारी, दृष्टिकोण और बच्चों को खाना खिलाने के तरीकों (KAP) का 'फूड नियोफोबिया' (food neophobia) से गहरा संबंध है। 'फूड नियोफोबिया' का अर्थ है छोटे बच्चों का नई या अनजान खाने की चीजों को आजमाने से हिचकिचाना।
'जर्नल ऑफ न्यूट्रिशनल साइंस' में प्रकाशित इस अध्ययन का शीर्षक "2-7 साल के बच्चों में फूड नियोफोबिया और इसके निर्धारक कारक" (Food neophobia and its determinants among children aged 2-7 years) है। इसमें अगस्त से अक्टूबर 2025 के बीच हैदराबाद के अड्डागुट्टा इलाके के कम आय वाले शहरी समुदाय से 150 माताओं और उनके बच्चों की जोड़ियों को शामिल किया गया था।
'चाइल्ड फूड नियोफोबिया स्केल' और WHO के मानवमितीय (anthropometric) मानकों का उपयोग करते हुए किए गए इस अध्ययन से पता चला कि लगभग 77 प्रतिशत बच्चों में मध्यम स्तर का फूड नियोफोबिया था, जबकि 11.3 प्रतिशत बच्चों में यह उच्च स्तर का और 12 प्रतिशत बच्चों में निम्न स्तर का पाया गया।
अध्ययन में लड़कों का औसत नियोफोबिया स्कोर लड़कियों की तुलना में अधिक रहा, लेकिन विभिन्न श्रेणियों के बीच यह अंतर सांख्यिकीय रूप से बहुत महत्वपूर्ण नहीं था। हालांकि, बच्चों की पोषण स्थिति (nutritional status) के साथ एक स्पष्ट संबंध देखने को मिला। जो बच्चे 'वेस्टिंग' (कम वजन और दुबलेपन) से पीड़ित थे, उनमें सामान्य बच्चों की तुलना में फूड नियोफोबिया का स्कोर अधिक था। NIN की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जिन बच्चों की माताओं का KAP स्कोर मध्यम था, उनमें फूड नियोफोबिया का स्कोर उन बच्चों की तुलना में कम था जिनकी माताओं का KAP स्कोर कम था। इससे पता चलता है कि बच्चों को खाना खिलाने के मामले में माता-पिता के व्यवहार का बड़ा असर पड़ता है।
ICMR-NIN के मुख्य शोधकर्ता और वैज्ञानिक-C, डॉ. कार्तिकेयन रामानुजम ने कहा कि बचपन के शुरुआती कार्यक्रमों में भोजन के समय को सकारात्मक अनुभव बनाने पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए बच्चों पर दबाव डाले बिना उन्हें बार-बार अलग-अलग तरह का भोजन देना चाहिए और जब बच्चे खाना खाने से मना करें, तो उनकी देखभाल करने वालों (caregivers) को सही सहयोग देना चाहिए। ICMR-NIN की निदेशक डॉ. भारती कुलकर्णी ने कहा कि इस अध्ययन के नतीजे 'इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज' (ICDS) और 'पोषण अभियान' जैसे मौजूदा मंचों के माध्यम से, बच्चों को खाना खिलाने से जुड़े व्यवहार संबंधी परामर्श (behavioural feeding counselling) को और मजबूत करने का अवसर प्रदान करते हैं।
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