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कैंची किडनैप मर्डर केस का आरोपी बरी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के एक अपहरण और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी को बरी कर दिया है। शीर्ष अदालत ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसलों को पलटते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। खास बात यह है कि एक सप्ताह के भीतर यह तीसरा ऐसा मामला बताया जा रहा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत से मिली दोषसिद्धि को पलटते हुए आरोपी को राहत दी है।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका था मामला
मामले में अभियोजन की कहानी मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित थी। ऐसे मामलों में कानून की स्थापित कसौटी है कि परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला इतनी स्पष्ट और मजबूत होनी चाहिए कि आरोपी के दोषी होने के अलावा कोई दूसरी तार्किक संभावना न बचे। सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों की समीक्षा करते हुए पाया कि अभियोजन की ओर से पेश की गई परिस्थितियों की कड़ियां आरोपी को अपराध से निर्णायक रूप से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं थीं।
निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
मामले में निचली अदालत ने अभियोजन की दलीलों और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया था। बाद में मामला हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां भी आरोपी को अपेक्षित राहत नहीं मिली। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शीर्ष अदालत ने पूरे मामले के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और अभियोजन की ओर से पेश परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा की।
संदेह का लाभ आरोपी को
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। संदेह चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह कानूनी रूप से ठोस सबूत की जगह नहीं ले सकता। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष की कहानी में ऐसी कमियां मौजूद थीं, जिनके कारण आरोपी की संलिप्तता को संदेह से परे स्थापित नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर उसे संदेह का लाभ देते हुए दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया गया।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
शीर्ष अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामले में हर परिस्थिति को विश्वसनीय तरीके से साबित किया जाना जरूरी है। इसके साथ ही सभी परिस्थितियों को आपस में जोड़ने वाली श्रृंखला भी पूरी होनी चाहिए। यदि इस श्रृंखला में कोई महत्वपूर्ण कड़ी गायब है या साक्ष्य किसी दूसरी संभावना की गुंजाइश छोड़ते हैं तो आरोपी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।
एक हफ्ते में तीसरा फैसला
यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निचली अदालत की दोषसिद्धि पलटने का यह तीसरा मामला बताया गया है। इन फैसलों में शीर्ष अदालत ने आपराधिक मामलों में सबूतों की गुणवत्ता और निष्पक्ष न्याय की जरूरत पर जोर दिया है। अदालत का रुख इस मूल कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करता है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को सजा से बचाना न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और दोषसिद्धि केवल ठोस तथा विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही होनी चाहिए।
जेल से रिहाई का रास्ता साफ
दोषसिद्धि रद्द होने के बाद आरोपी की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है, बशर्ते वह किसी दूसरे मामले में हिरासत में न हो। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आपराधिक न्याय व्यवस्था में 'संदेह से परे प्रमाण' के सिद्धांत की अहमियत को एक बार फिर सामने लाता है। इस मामले में शीर्ष अदालत ने साफ संदेश दिया है कि गंभीर से गंभीर अपराध में भी दोषसिद्धि केवल आरोप की गंभीरता के आधार पर नहीं बल्कि कानून की कसौटी पर खरे उतरने वाले प्रमाणों के आधार पर हो सकती है।
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