
Tamil Nadu तमिलनाडु: नेशनल स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (NSI) द्वारा जारी ताजा राज्यवार डेटा के अनुसार, दक्षिण भारत में सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों की सबसे अधिक दर तमिलनाडु में दर्ज की गई है। यह रिपोर्ट देश में सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग को लेकर तैयार की गई है।
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक वर्ष में तमिलनाडु में ग्रामीण क्षेत्रों के 47.5 प्रतिशत लोग सरकारी अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज कराने पहुंचे, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 38.6 प्रतिशत रहा। दोनों को मिलाकर राज्य में कुल 43 प्रतिशत लोग सरकारी अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज करवा रहे हैं, जो दक्षिण भारत में सबसे अधिक है।
NSI के इस डेटा में अन्य दक्षिणी राज्यों की तुलना भी की गई है। इसके अनुसार, आंध्र प्रदेश में 26.9 प्रतिशत, केरल में 30 प्रतिशत, कर्नाटक में 29.8 प्रतिशत और तेलंगाना में 29.3 प्रतिशत लोगों ने सरकारी अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज कराया। वहीं पश्चिमी राज्यों में यह आंकड़ा और कम पाया गया, जहां गुजरात में 25.9 प्रतिशत और महाराष्ट्र में केवल 18.6 प्रतिशत लोग ही सरकारी अस्पतालों में भर्ती हुए।
इस रिपोर्ट के आधार पर स्पष्ट होता है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग के मामले में तमिलनाडु दक्षिण भारत में सबसे आगे है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतर पहुंच और लोगों की बढ़ती निर्भरता को दर्शाती है।
तमिलनाडु के पब्लिक हेल्थ मंत्री एम. सुब्रमण्यम ने इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राज्य सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के कारण अधिक लोग सरकारी अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य हर वर्ग के लोगों तक सुलभ और मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है।
उन्होंने यह भी बताया कि आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं और राज्य सरकार की मुफ्त चिकित्सा योजनाओं ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों का भरोसा बढ़ाया है। इसके चलते सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह डेटा देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की स्थिति और लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता को भी दर्शाता है। तमिलनाडु में लगातार बेहतर होती स्वास्थ्य सेवाएं इस उच्च उपयोग दर का एक प्रमुख कारण मानी जा रही हैं।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी अस्पतालों की भूमिका पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है।





