तमिलनाडू

Tamil Nadu : शिक्षा नीति पर राज्यपाल रवि का बड़ा बयान

Kavita2
12 July 2026 9:57 AM IST
Tamil Nadu : शिक्षा नीति पर राज्यपाल रवि का बड़ा बयान
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चेन्नई : तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को भारतीय शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक सोच से मुक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताते हुए कहा कि यदि नीति में किसी प्रकार के सुधार की आवश्यकता है तो उस पर चर्चा की जा सकती है, लेकिन इसे लागू करने से ही इनकार करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि ऐसे जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें।

शनिवार को चेन्नई के अरुंबक्कम स्थित डी. जी. वैष्णव कॉलेज के 59वें दीक्षांत समारोह (कॉन्वोकेशन) में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए राज्यपाल ने 3,225 विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान कीं। इस अवसर पर उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए शिक्षा, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर विस्तार से अपने विचार रखे।

राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका लाभ पूरे समाज तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि समाज ने उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया है, इसलिए उनका भी कर्तव्य है कि वे अपने ज्ञान, कौशल और अनुभव का उपयोग समाज की सेवा के लिए करें।

उन्होंने कहा कि किसी भी शिक्षित व्यक्ति की जिम्मेदारी केवल अपने करियर तक सीमित नहीं होती। यदि शिक्षा समाज के विकास में योगदान नहीं देती, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के प्रति भी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करें।

राज्यपाल ने अपने संबोधन में भारत की शिक्षा व्यवस्था के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय तक देश में ऐसी शिक्षा प्रणाली प्रभावी रही, जिसने व्यक्ति को मुख्य रूप से व्यक्तिगत हितों तक सीमित कर दिया। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था ने लोगों के मन में "मैं, मेरा परिवार और मेरी नौकरी" जैसी सोच को अधिक बढ़ावा दिया, जबकि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना अपेक्षाकृत कमजोर होती चली गई।

उन्होंने कहा कि ऐसी मानसिकता में बदलाव लाने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार की गई है। उनके अनुसार, इस नीति का प्रमुख उद्देश्य केवल डिग्रीधारी या पेशेवर तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे बेहतर इंसान तैयार करना है जो नैतिक मूल्यों, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण हों।

राज्यपाल ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक सोच से मुक्त करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। उनका कहना था कि यदि किसी नीति के कुछ प्रावधानों पर मतभेद हैं या उनमें सुधार की आवश्यकता महसूस होती है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उस पर चर्चा की जा सकती है और आवश्यक संशोधन भी किए जा सकते हैं। लेकिन किसी नीति को पूरी तरह लागू करने से इनकार करना समाधान नहीं माना जा सकता।

उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था समय के साथ बदलती रहती है और नई चुनौतियों के अनुरूप उसमें सुधार आवश्यक होते हैं। इसलिए किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके उद्देश्यों और संभावित लाभों के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि किसी स्तर पर व्यावहारिक कठिनाइयां हैं, तो उन्हें संवाद और सहयोग के माध्यम से दूर किया जा सकता है।

दीक्षांत समारोह के दौरान राज्यपाल ने स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के 3,225 विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान कीं। उन्होंने विद्यार्थियों को उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं देते हुए कहा कि अब उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हो रहा है। उन्होंने छात्रों से कहा कि वे अपनी शिक्षा का उपयोग केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और देश के विकास में योगदान देने के लिए भी करें।

उन्होंने कहा कि आज का भारत तेजी से बदल रहा है और विभिन्न क्षेत्रों में नए अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। ऐसे समय में युवाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने विद्यार्थियों से नवाचार, अनुसंधान, सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में कॉलेज प्रशासन, शिक्षकों, विद्यार्थियों और अभिभावकों की बड़ी संख्या मौजूद रही। दीक्षांत समारोह के दौरान मेधावी विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सम्मानित भी किया गया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर तमिलनाडु में पहले से ही राजनीतिक और शैक्षणिक स्तर पर चर्चा होती रही है। ऐसे माहौल में राज्यपाल का यह बयान एक बार फिर इस विषय को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ले आया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी नीति पर रचनात्मक सुझाव और सुधार का स्वागत किया जा सकता है, लेकिन उसका पूरी तरह विरोध करने के बजाय संवाद और सुधार के रास्ते पर आगे बढ़ना अधिक उचित होगा।

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