तमिलनाडू

भारत में पहली बार डेंगू वैक्सीन का ट्रायल शुरू

Rajeshwari Nishad
19 Oct 2026 5:48 PM IST
भारत में पहली बार डेंगू वैक्सीन का ट्रायल शुरू
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तेनकासी। भारत में डेंगू की रोकथाम के प्रयासों को नई दिशा देने के लिए तमिलनाडु के तेनकासी जिले के कडयानल्लूर में वैक्सीन से जुड़ी पायलट पहल शुरू की गई है। इस कार्यक्रम के तहत जापानी दवा कंपनी टाकेडा की विकसित डेंगू वैक्सीन क्यूडेंगा (Qdenga) के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह समझना है कि डेंगू के अधिक मामले वाले क्षेत्र में यह टीका संक्रमण की रोकथाम में कितना प्रभावी साबित होता है और भविष्य में इसे अन्य इलाकों में इस्तेमाल करने की संभावनाएं क्या हैं।
इस पहल को भारत में डेंगू नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, पायलट अध्ययन शुरू होने का अर्थ यह नहीं है कि वैक्सीन डेंगू के सभी मामलों को रोक देगी या इसे तत्काल देशभर में लगाया जाएगा। अध्ययन से प्राप्त नतीजों, सुरक्षा संबंधी जानकारी और विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर आगे की रणनीति तय करने में मदद मिलेगी।
कडयानल्लूर को क्यों चुना गया?
तमिलनाडु के तेनकासी जिले में स्थित कडयानल्लूर को डेंगू के अधिक मामलों वाले क्षेत्रों में शामिल बताया गया है। ऐसे इलाके में वैक्सीन का अध्ययन करने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि वास्तविक परिस्थितियों में टीका कितना असर दिखाता है।
समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री के. जी. अरुणराज ने 17 अक्टूबर 2026 को इस पहल की शुरुआत की जानकारी दी। इस अध्ययन में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान यानी ICMR-NIE की भागीदारी भी बताई गई है। रिपोर्टों में कडयानल्लूर नगरपालिका के 33 वार्डों में अध्ययन किए जाने का उल्लेख है।
अध्ययन के जरिए स्थानीय स्तर पर वैक्सीन के प्रभाव और उससे जुड़ी जानकारी का मूल्यांकन किया जाएगा। इसके नतीजे भविष्य में दूसरे जिलों या क्षेत्रों में टीकाकरण से संबंधित निर्णय लेने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, राज्य के अन्य हिस्सों में इसका विस्तार कब और किस आधार पर किया जाएगा, यह अध्ययन के निष्कर्षों और अधिकारियों के फैसले पर निर्भर करेगा।
क्या है क्यूडेंगा वैक्सीन?
क्यूडेंगा को TAK-003 के नाम से भी जाना जाता है। इसे टाकेडा ने विकसित किया है। यह एक लाइव एटेन्यूएटेड टेट्रावैलेंट वैक्सीन है, जिसमें डेंगू वायरस के चारों सीरोटाइप—DENV-1, DENV-2, DENV-3 और DENV-4—के कमजोर किए गए रूपों पर आधारित तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। डेंगू वायरस के अलग-अलग सीरोटाइप होने के कारण बीमारी के खिलाफ सुरक्षा का आकलन करना जटिल होता है।
भारत में इस वैक्सीन को लेकर एक महत्वपूर्ण नियामकीय कदम जुलाई 2026 में उठाया गया था। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने क्यूडेंगा को 4 से 60 वर्ष की आयु के लोगों में डेंगू की रोकथाम के लिए विपणन प्राधिकरण दिया। केंद्र सरकार के अनुसार, निर्धारित कार्यक्रम में इसकी दो खुराक दी जाती हैं और दोनों खुराकों के बीच तीन महीने का अंतर रखा जाता है।
यह मंजूरी भारत में डेंगू की रोकथाम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन वैक्सीन के इस्तेमाल का निर्णय उम्र, स्वास्थ्य संबंधी स्थिति, उपलब्ध दिशानिर्देशों और चिकित्सकीय सलाह को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
कितना असरदार है यह टीका?
डेंगू वैक्सीन की प्रभावशीलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाता कि टीका लगने के बाद कितने लोगों में संक्रमण हुआ। इसमें यह भी देखा जाता है कि संक्रमण के गंभीर होने, अस्पताल में भर्ती होने और अलग-अलग वायरस सीरोटाइप के खिलाफ सुरक्षा पर क्या असर पड़ता है।
क्यूडेंगा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में प्रभावशीलता और सुरक्षा का मूल्यांकन किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस वैक्सीन को प्रीक्वालिफिकेशन भी दिया है। हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्यक्रम संबंधी सिफारिश विशेष रूप से 6 से 16 वर्ष के बच्चों के लिए है, उन क्षेत्रों में जहां डेंगू का संक्रमण अधिक है। WHO यह भी स्पष्ट करता है कि वैक्सीन डेंगू के हर मामले को रोकने की गारंटी नहीं देती।
भारत में कडयानल्लूर में शुरू किया गया पायलट अध्ययन इसलिए अहम है, क्योंकि स्थानीय परिस्थितियों में प्राप्त नतीजे सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े निर्णयों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन अध्ययन पूरा होने से पहले इसके वास्तविक प्रभाव के बारे में निश्चित दावा करना उचित नहीं होगा।
वैक्सीन के साथ मच्छरों पर नियंत्रण भी जरूरी
डेंगू एडीज मच्छरों के काटने से फैलता है। इसलिए वैक्सीन की उपलब्धता के बावजूद मच्छरों
के प्रजनन पर रोक लगाना, घरों और आसपास पानी जमा नहीं होने देना तथा मच्छर के काटने से बचाव करना जरूरी है।
डेंगू फैलाने वाले मच्छर साफ पानी में भी पनप सकते हैं। घरों की छतों, गमलों, कूलर, टंकियों, पुराने टायरों और खुले बर्तनों में जमा पानी उनके प्रजनन का कारण बन सकता है। ऐसे स्थानों की नियमित सफाई और पानी को ढककर रखना बचाव के महत्वपूर्ण उपाय हैं।
इसके अलावा, बुखार, तेज सिरदर्द, शरीर में दर्द या अन्य लक्षण होने पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। पेट में तेज दर्द, लगातार उल्टी, रक्तस्राव, अत्यधिक कमजोरी या सांस लेने में परेशानी जैसे संकेत गंभीर डेंगू की ओर इशारा कर सकते हैं और तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत होती है।
WHO भी डेंगू नियंत्रण के लिए टीकाकरण को मच्छर नियंत्रण, बीमारी की निगरानी, समय पर जांच और उचित उपचार के साथ अपनाने पर जोर देता है
आगे क्या होगा?
कडयानल्लूर में शुरू हुई पायलट पहल से मिलने वाले नतीजे यह समझने में मदद कर सकते हैं कि डेंगू के अधिक मामले वाले क्षेत्र में क्यूडेंगा वैक्सीन का वास्तविक प्रभाव कैसा रहता है। इसके आधार पर तमिलनाडु में आगे की रणनीति और अन्य क्षेत्रों में संभावित इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है।
फिलहाल, यह पहल डेंगू की रोकथाम के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने की दिशा में एक अहम कदम है। इसकी सफलता का आकलन अध्ययन के निष्कर्षों, सुरक्षा निगरानी और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा। वैक्सीन को डेंगू नियंत्रण के व्यापक प्रयासों का हिस्सा मानना जरूरी है, न कि मच्छरों से बचाव और समय पर इलाज का विकल्प।
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