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Sirohi:राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन माउंट आबू और अरावली की दुर्गम पहाड़ियों में प्रकृति के कई ऐसे अनसुलझे रहस्य और धार्मिक स्थल छिपे हैं, जो आज भी लोगों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर देते हैं। सिरोही जिले के अरावली की वादियों में बसे आबूराज और उसके आसपास के इलाके में ऐसे कई स्थान हैं, जो यहाँ के संतों की कठिन तपस्या और प्राचीन धार्मिक मान्यताओं की वजह से अपनी एक खास पहचान रखते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत और चमत्कारी स्थान है— उमरनी गांव के पास एक पहाड़ी पर बनी 'अधर शिला'।
यह विशालकाय चट्टान सदियों से बिना किसी मजबूत सहारे के हवा में तैरती हुई सी नजर आती है। विज्ञान के नियमों को चुनौती देती इस अधर शिला का रहस्य आज भी पूरी तरह बरकरार है। स्थानीय लोगों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवराज इंद्र का वज्र भी इस शिला को अपनी जगह से डिगा नहीं पाया था।
मुख्य पहाड़ से ऊपर उठी है यह विशाल चट्टान
इस बेहद अनोखी और विशाल चट्टान का नाम 'अधर शिला' इसके मुख्य पहाड़ से कुछ ऊंचाई पर उठे हुए नजर आने की वजह से पड़ा है। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह भारी-भरकम चट्टान जमीन या पहाड़ से पूरी तरह जुड़ी हुई नहीं है, बल्कि हवा में ही टिकी हुई है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने वाले लोग जहाँ इसे गुरुत्वाकर्षण (Gravity) और प्रकृति का एक अनोखा संतुलन मानते हैं, वहीं क्षेत्र के लोगों की इस स्थान से गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि इस चट्टान के पीछे भगवान का कोई बड़ा चमत्कार और प्राचीन इतिहास छिपा हुआ है।
राजा अम्बरीष की तपोभूमि और अमरावती नगरी का इतिहास
अधर शिला के पास ही स्थित प्राचीन भद्रकाली मंदिर के पुजारी राजू महाराज ने इस स्थान के इतिहास को लेकर एक बेहद रोचक पौराणिक कथा बताई। उन्होंने बताया कि सैकड़ों वर्ष पहले इस क्षेत्र में इक्ष्वाकु वंश के परमवीर और परम प्रतापी राजा अम्बरीष की 'अमरावती नगरी' हुआ करती थी। राजा अम्बरीष भगवान विष्णु के परम भक्त थे।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा अम्बरीष ने इसी पहाड़ी और अधर शिला वाले स्थान पर बैठकर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक अन्न-जल त्यागकर कड़ी तपस्या की थी। उनकी इस घोर भक्ति और निश्छल तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और उनसे कोई मनचाहा वर मांगने को कहा। इस पर राजा अम्बरीष ने अपने लिए कुछ न मांगकर, अपनी पूरी प्रजा और क्षेत्र के सभी जीव-जंतुओं को सशरीर (जीवित शरीर के साथ) स्वर्ग ले जाने का वरदान मांग लिया। भगवान विष्णु ने उनकी यह इच्छा पूरी कर दी।
एक छोटे से अहंकार ने रोक दिया स्वर्ग का विमान
भगवान से वरदान मिलने के बाद जब राजा अम्बरीष की पूरी प्रजा और जीव-जंतु सशरीर स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर रहे थे, ठीक उसी समय राजा के मन में एक क्षण के लिए अहंकार (अभिमान) आ गया। राजा को लगा कि उनकी तपस्या में इतना ज्यादा बल है कि उनके कारण आज उनकी पूरी प्रजा जीवित ही स्वर्ग जा रही है।
अहंकार का परिणाम: शास्त्रों के अनुसार, भक्ति में अभिमान आते ही उसका पुण्य क्षीण हो जाता है। जैसे ही राजा अम्बरीष को यह अहंकार आया, वैसे ही प्रजा को स्वर्ग की ओर ले जा रहा दिव्य विमान बीच रास्ते में ही रुक गया।
विमान के रुकते ही राजा अम्बरीष को तुरंत अपनी भयानक भूल और अंतरात्मा में उपजे अहंकार का एहसास हो गया। उन्होंने अत्यंत व्याकुल होकर भगवान विष्णु से अपने इस अपराध के लिए क्षमा मांगी। राजा ने अपनी गलती के प्रायश्चित के रूप में भगवान से प्रार्थना की कि उनकी निर्दोष प्रजा को स्वर्ग भेज दिया जाए और सजा के तौर पर उन्हें (राजा को) यहीं धरती पर ही छोड़ दिया जाए।
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