High Court ने दी मंजूरी, कैदियों के विवाह का रास्ता साफ

Jaipur जयपुर : राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और अनोखे फैसले में उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदियों को शादी करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने कहा कि अपनी इच्छा से विवाह करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के जेल में होने से उसके मौलिक अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते।
यह आदेश राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ की खंडपीठ ने सुनाया। जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की बेंच ने नागौर निवासी मूलाराम की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। मूलाराम वर्तमान में जोधपुर के मंडोर स्थित ओपन एयर कैंप परिसर में उम्रकैद की सजा काट रहा है।
जानकारी के अनुसार, मूलाराम को 16 फरवरी 2017 से उम्रकैद की सजा भुगतनी पड़ रही है। उसने अदालत में याचिका दायर कर विवाह करने की अनुमति मांगी थी। याचिका में उसने अपनी सजा को कुछ समय के लिए स्थगित करने की मांग की थी, ताकि वह विवाह की प्रक्रिया पूरी कर सके।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विवाह केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन, सम्मान और व्यक्तिगत निर्णय से जुड़ा अधिकार है। दो बालिग व्यक्तियों का अपनी इच्छा से शादी करने का फैसला उनके व्यक्तिगत अधिकारों के अंतर्गत आता है। कोर्ट ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी माना कि जेल में बंद व्यक्ति भी समाज का हिस्सा होता है और उसके कुछ मौलिक अधिकार सुरक्षित रहते हैं। हालांकि, अपराध की सजा के कारण उसकी कुछ स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, लेकिन व्यक्तिगत जीवन से जुड़े अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं किए जा सकते।
राजस्थान में ओपन जेल व्यवस्था के तहत कैदियों को सुधार और पुनर्वास का अवसर दिया जाता है। ओपन एयर कैंप में रहने वाले कैदियों को सीमित स्वतंत्रता दी जाती है, ताकि वे समाज से जुड़े रह सकें और अपने जीवन को बेहतर दिशा दे सकें। इसी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए अदालत ने विवाह की अनुमति देने का फैसला लिया।
याचिकाकर्ता मूलाराम की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वह लंबे समय से सजा काट रहा है और अब अपने जीवन में एक नई शुरुआत करना चाहता है। उसने अपनी व्यक्तिगत इच्छा और सामाजिक जीवन को ध्यान में रखते हुए शादी की अनुमति मांगी थी।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विवाह की अनुमति प्रदान कर दी। कोर्ट के इस फैसले को कैदियों के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला इस बात को मजबूत करता है कि कानून के तहत सजा पाने के बाद भी व्यक्ति के सभी संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। जेल प्रशासन और न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी होता है।
राजस्थान हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों के लिए व्यक्तिगत अधिकारों को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून का पालन करते हुए हर व्यक्ति को सम्मान और व्यक्तिगत निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है।





