पंजाब

BJP और अकाली दल की दोस्ती पर फिर चर्चा चुनाव से पहले क्यों बढ़ी हलचल

Ratna Netam
25 Aug 2026 7:22 PM IST
BJP और अकाली दल की दोस्ती पर फिर चर्चा चुनाव से पहले क्यों बढ़ी हलचल
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चंडीगढ़।पंजाब की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के संभावित गठबंधन को लेकर लंबे समय से चल रही अटकलों पर अब नया मोड़ आ गया है। दोनों दलों के पुराने रिश्तों, चुनावी समीकरणों और राजनीतिक जरूरतों के बीच यह सवाल लगातार बना हुआ है कि क्या BJP और अकाली दल एक बार फिर साथ आएंगे या फिर दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरेंगी।
हालांकि हालिया संकेतों में बीजेपी ने पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर अकेले मैदान में उतरने की तैयारी के संकेत दिए हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष ने कहा है कि पार्टी पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
क्यों चर्चा में आया BJP-SAD गठबंधन?
BJP और शिरोमणि अकाली दल का रिश्ता पंजाब की राजनीति में काफी पुराना रहा है। दोनों दल लंबे समय तक एनडीए के सहयोगी रहे और कई चुनावों में मिलकर मैदान में उतरे।
लेकिन साल 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच मतभेद बढ़ गए थे। इसके बाद अकाली दल ने बीजेपी से अपना गठबंधन तोड़ लिया था। इस फैसले के बाद दोनों पार्टियों ने अलग-अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया।
अब आगामी चुनाव को देखते हुए दोनों दलों के नेताओं के बयानों ने एक बार फिर गठबंधन की संभावनाओं को चर्चा में ला दिया था।
अकाली नेताओं के बयानों से बढ़ी हलचल
हाल के दिनों में अकाली दल के कुछ नेताओं की ओर से बीजेपी के साथ दोबारा तालमेल को लेकर सकारात्मक संकेत दिए गए थे। अकाली नेताओं का तर्क रहा कि पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्य में मजबूत राजनीतिक तालमेल जरूरी हो सकता है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के बयानों के बाद भी राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हुई कि दोनों दल पुराने रिश्ते को फिर से मजबूत कर सकते हैं।
हालांकि बीजेपी की ओर से अब तक गठबंधन को लेकर स्पष्ट हरी झंडी नहीं दी गई है।
बीजेपी अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में
बीजेपी ने पंजाब में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी का मानना है कि राज्य में उसका आधार पहले से बढ़ा है और अब संगठन को और मजबूत करके वह अकेले चुनाव लड़ सकती है।
बीजेपी की नजर उन मतदाताओं पर भी है जो पारंपरिक रूप से अन्य दलों के साथ जुड़े रहे हैं। पार्टी दलित, शहरी और युवा वोटरों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
अकेले लड़ने में क्या चुनौती है?
पंजाब में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करना है। राज्य की राजनीति में किसान, ग्रामीण मतदाता और धार्मिक-सामाजिक समीकरण बेहद अहम भूमिका निभाते हैं।
अकाली दल का लंबे समय से ग्रामीण और सिख वोट बैंक में प्रभाव रहा है। ऐसे में गठबंधन टूटने के बाद बीजेपी के लिए अकेले चुनाव लड़ना आसान चुनौती नहीं होगी।
अकाली दल के लिए भी बड़ी परीक्षा
दूसरी ओर, अकाली दल के सामने भी अपना पुराना जनाधार वापस हासिल करने की चुनौती है। पिछले कुछ चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा है।
अगर अकाली दल अकेले चुनाव लड़ता है तो उसे आम आदमी पार्टी (AAP), कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों से मुकाबला करना होगा।
AAP और कांग्रेस पर भी नजर
पंजाब की मौजूदा राजनीति में आम आदमी पार्टी एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है। 2022 के विधानसभा चुनाव में AAP ने बड़ी जीत हासिल कर सरकार बनाई थी।
वहीं कांग्रेस भी राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में BJP और SAD के बीच संभावित गठबंधन या अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला पूरे चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
गठबंधन हुआ तो क्या बदलेंगे समीकरण?
अगर BJP और अकाली दल फिर से साथ आते हैं तो दोनों पार्टियों को अपने-अपने मजबूत क्षेत्रों का फायदा मिल सकता है।
अकाली दल जहां ग्रामीण और पारंपरिक वोट बैंक में प्रभाव रखता है, वहीं बीजेपी शहरी क्षेत्रों और केंद्र सरकार से जुड़े मुद्दों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
दोनों के साथ आने से विपक्षी दलों के लिए मुकाबला और कठिन हो सकता है।
गठबंधन नहीं हुआ तो क्या होगा?
अगर दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो पंजाब में बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है। इससे वोटों का बंटवारा भी हो सकता है।
बीजेपी का अकेले चुनाव लड़ना उसके लिए संगठन विस्तार का मौका हो सकता है, लेकिन उसे जमीनी स्तर पर ज्यादा मेहनत करनी होगी।
आगे की रणनीति पर टिकी नजर
फिलहाल बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी के संकेत दिए हैं, जबकि अकाली दल की ओर से गठबंधन की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक बयान आते रहे हैं।
आने वाले समय में दोनों दलों की बातचीत और चुनावी रणनीति से ही साफ होगा कि पंजाब की राजनीति किस दिशा में जाएगी।
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