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Punjab नवंबर 2017 में, मोगा में पुलिस पूछताछ की मेज़ के आमने-सामने दो लोग बैठे थे। एक ब्रिटिश नागरिक था जो शादी करने के लिए UK से भारत आया था। जग्तार सिंह जोहल, उर्फ जग्गी, सिखों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट और ब्लॉगर थे। गिरफ्तारी से पहले, वह NeverForget84.com नाम की वेबसाइट चलाते थे और उसमें योगदान देते थे। यह वेबसाइट 1984 के सिख-विरोधी दंगों का रिकॉर्ड रखती थी और पंजाब पुलिस की आलोचना करने वाले पंजाबी भाषा के कंटेंट का अंग्रेजी में अनुवाद करके अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाती थी।
दूसरे व्यक्ति मोगा के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (SSP) राज जीत सिंह थे, जो एक सम्मानित अधिकारी थे और जिन पर उनके सीनियर पंजाब के सबसे मुश्किल केस सुलझाने के लिए भरोसा करते थे। नौ साल बाद, दोनों व्यक्ति जेल में हैं। उनके केस पूरी तरह से अलग हैं, लेकिन किस्मत के अजीब खेल की वजह से वे जिस रास्ते पर यहाँ तक पहुँचे, वे आपस में जुड़े हुए हैं। जोहल को नवंबर 2017 में मोगा पुलिस ने इस आरोप में गिरफ्तार किया था कि उन्होंने पंजाब में हिंदू दक्षिणपंथी नेताओं की 17 टारगेटेड हत्याओं के लिए पैसे दिए थे। पीड़ितों में RSS के रिटायर्ड ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा, अमित शर्मा और रविंदर गोसाईं शामिल थे।
इस गिरफ्तारी से मोगा के तत्कालीन SSP राज जीत सिंह को काफी पहचान मिली; पुलिस ने हत्याओं के पीछे की साजिश का पता लगाने में उनकी भूमिका को सराहा। जिस केस में जग्गी को सबसे पहले हिरासत में लिया गया, वह दिसंबर 2016 में बाघापुराना पुलिस स्टेशन में 'गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA), 'आर्म्स एक्ट' और IPC की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया था। आखिरकार नौ लोगों को आरोपी बनाया गया: जोहल, तलजीत सिंह उर्फ जिमी, रमनदीप सिंह उर्फ बग्गा, धर्मिंदर उर्फ गुगनी, हरमिंदर सिंह उर्फ मिंटू (जिनकी मौत के बाद उनके खिलाफ कार्यवाही बंद हो गई), हरदीप सिंह उर्फ पहलवान/शेरा, अनिल कुमार उर्फ काला, जगजीत सिंह उर्फ जग्गी और तरलोक सिंह उर्फ लाडी।
उसके बाद के साल दोनों व्यक्तियों के लिए बहुत अलग रहे। जोहल की लंबी कानूनी लड़ाई
अभी तिहाड़ जेल में बंद जोहल ने UAPA, आर्म्स एक्ट और हत्या से जुड़ी IPC की धाराओं के तहत दर्ज सात मामलों से लड़ने में लगभग नौ साल बिताए हैं। इन मामलों की सुनवाई दिल्ली की NIA कोर्ट कर रही है।
मार्च 2025 में, मोगा के एक एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज ने बाघापुराना मामले में जोहल समेत नौ आरोपियों में से छह को बरी कर दिया। अभियोजन पक्ष ने 56 गवाहों से पूछताछ की थी, लेकिन कोर्ट ने माना कि वे आरोप साबित करने में नाकाम रहे। कोर्ट ने यह भी पाया कि जांच का कुछ हिस्सा ऐसे अधिकारी ने किया था जिसका पद ऐसे मामलों के लिए तय पद से नीचे का था।
तीन सह-आरोपियों — तलजीत, रमनदीप और हरदीप — को आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया और दो-दो साल की सज़ा सुनाई गई। इस साल 18 सितंबर को, दिल्ली हाई कोर्ट ने कथित साजिश से जुड़े सात और मामलों में जोहल को ज़मानत दे दी। उनके वकील ने दलील दी कि वे पहले ही आठ साल से ज़्यादा समय जेल में बिता चुके हैं, जबकि अभियोजन पक्ष के लगभग 163 गवाहों में से सिर्फ़ 40 से ही पूछताछ हो पाई थी।
हाई कोर्ट की बेंच ने अनुच्छेद 21 और UAPA के तहत लंबे समय तक जेल में रखने के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। ज़मानत के आदेश में कुछ शर्तें भी रखी गईं, जैसे जोहल का पासपोर्ट जमा करना और उनके आने-जाने और सार्वजनिक बयानों पर रोक लगाना। हालांकि, जोहल हत्या के मामलों में अभी भी आरोपी हैं और न्यायिक हिरासत में हैं।
राज जीत सिंह का उत्थान और पतन राज जीत सिंह को पहचान तब तेज़ी से मिली जब पुलिस ने टारगेटेड-किलिंग (चुनिंदा हत्याओं) के मामलों में बड़ी कामयाबी का दावा किया। नवंबर 2017 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने आवास पर अलग-अलग रैंक के 80 से ज़्यादा पुलिसकर्मियों को बुलाया। यह सम्मान उन्हें टेरर मॉड्यूल का भंडाफोड़ करने और मोगा जांच समेत टारगेटेड-किलिंग के मामलों को सुलझाने में पुलिस बल की सफलता के लिए दिया गया था।
इस कामयाबी का श्रेय पाने वाली टीम में IG (इंटेलिजेंस) अमित प्रसाद, DIG रणबीर खत्रा, मोगा और बटाला के SSP और कई इंस्पेक्टर व कॉन्स्टेबल शामिल थे। अमरिंदर ने DGP को ऐसे अधिकारियों को इनाम देने की योजना बनाने का निर्देश दिया। एक महीने बाद, इस मामले में अपनी भूमिका के लिए राज जीत का नाम दूसरे पुलिस मेडल के लिए सुझाया गया। उन्हें अगस्त 2013 में पहले ही ऐसा एक मेडल मिल चुका था।
बाद में दूसरी सिफारिश को रद्द कर दिया गया, क्योंकि ऐसी खबरें सामने आईं कि यह सिफारिश एक ऐसे अधिकारी के लिए की गई थी जो पहले से ही एक अलग मामले में जांच का सामना कर रहा था। यह घटनाक्रम पुलिस विभाग के अंदर खुली गुटबाजी के बीच हुआ; एक गुट राज जीत को एक काबिल जांचकर्ता मानकर उनका समर्थन कर रहा था, जबकि दूसरा गुट उनकी जांच की मांग कर रहा था। यह विवाद आखिरकार पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट तक पहुंच गया और DGP के पद को लेकर पुलिस महकमे में चल रही बड़ी सत्ता की लड़ाई का हिस्सा बन गया।
राज जीत के पतन की शुरुआत जोहल की गिरफ्तारी से उन्हें मिली तारीफ के कुछ ही महीनों बाद हुई। क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी में उनके डिप्टी, इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह को स्पेशल टास्क फोर्स ने हेरोइन, हथियारों और बिना हिसाब-किताब वाले कैश के साथ पकड़ा। जांचकर्ताओं ने जल्द ही राज जीत पर ध्यान केंद्रित किया। उन पर आरोप लगा कि उन्होंने ड्रग तस्करों को बचाने के लिए अपने पद का इस्तेमाल किया और तरनतारन में SSP के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान इंदरजीत द्वारा नशीले पदार्थों के मामलों में हासिल किए गए संदिग्ध बरी होने के फैसलों में शामिल रहे।
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