पंजाब

25 साल पुराने मामले में HC सख्त, 2 लाख जुर्माना

Kiran
5 Oct 2026 11:25 AM IST
25 साल पुराने मामले में HC सख्त, 2 लाख जुर्माना
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पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 2001 से लंबित पेंशन मामले में लिखित बयान दाखिल न करने की तीसरी बार की चूक के लिए पंजाब पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने कहा कि बार-बार की यह चूक "साफ़ तौर पर इस कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करने और कोर्ट की कार्यवाही को बाधित करने की जानबूझकर की गई कोशिश को दिखाती है।" यह रकम कोर्ट द्वारा पहले दो मौकों पर लगाए गए 1.5 लाख रुपये के जुर्माने के अलावा है। साथ ही, कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव के.ए.पी. सिन्हा को नोटिस जारी कर यह बताने को कहा कि उनके खिलाफ 'अदालत की अवमानना ​​अधिनियम' (Contempt of Courts Act) के तहत कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि कोर्ट इस मामले में शामिल दो सरकारी प्रतिवादियों के व्यवहार से "हैरान और दुखी" है। उन्होंने लिखित बयान दाखिल नहीं किया, जबकि मुख्य सचिव को खुद राज्य के इस रवैये के बारे में बताया गया था—एक ऐसा मामला जिसमें पिछले 24 साल से ज़्यादा समय से जवाब दाखिल नहीं किया गया था।
जस्टिस मौदगिल ने कहा कि कोर्ट जुर्माना लगाने के लिए मजबूर हुआ, जो राज्य या राज्य के वकील को शायद ज़्यादा लग सकता है। फिर भी, इतने साल बीत जाने के बाद भी प्रतिवादियों ने कोर्ट के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं दिखाई; इसमें वह समय भी शामिल है जब कोर्ट ने मुख्य सचिव से सवाल किया था और उन्हें मामले की जानकारी दी थी। बेंच ने निर्देश दिया, "या तो प्रतिवादी-राज्य के पास सरकारी खजाने में बहुत पैसा है या फिर उन्हें लोगों की मेहनत की कमाई की कोई परवाह नहीं है; यह पैसा इनकम-टैक्स देने वालों की जेब से आता है, न कि राज्य सरकार की अपनी कोई दौलत है। इस फंड का इस्तेमाल किसी बेहतर मकसद के लिए किया जाए, जिससे कम से कम इस कोर्ट के बार सदस्यों के परिवारों को मदद मिल सके।"
शुरुआत में, जस्टिस मौदगिल ने पिछले 25 सालों से लिखित बयान दाखिल न करने के लिए पंजाब के "लापरवाह और उदासीन रवैये" पर फटकार लगाई थी और 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। सुनवाई की अगली तारीख पर, बेंच ने अपने निर्देशों का लगातार पालन न करने के लिए 50,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया। यह आदेश दिया गया कि यह रकम स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण निदेशक के वेतन से बराबर-बराबर काटी जाए।
जब मामले की सुनवाई दोबारा शुरू हुई, तो जस्टिस मौदगिल ने आदेश का पालन सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी राज्य के मुख्य सचिव पर डालते हुए उन्हें हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। बेंच ने निर्देश दिया, "पंजाब सरकार के मुख्य सचिव अगली सुनवाई की तारीख पर एक हलफनामा दाखिल करेंगे, जिसमें स्पष्ट रूप से बताया जाएगा कि 50,000 रुपये की राशि अधिकारियों के वेतन/पारिश्रमिक से काट ली गई है और इस अदालत के आदेशानुसार खाते में जमा कर दी गई है।"
जस्टिस मौदगिल ने निर्देश दिया, "यदि पंजाब सरकार के मुख्य सचिव अगली सुनवाई की तारीख तक ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहना होगा।" इस बीच, बेंच के समक्ष पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता राजीव वर्मा ने तर्क दिया कि यह आश्चर्यजनक है कि अदालत राज्य पर जुर्माना बढ़ा रही है, जबकि याचिकाकर्ता ने खुद मामले को आगे न बढ़ाने का फैसला किया था और पिछली तीन तारीखों पर उपस्थित नहीं हुआ था।
अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि "राज्य खुद को ऐसा पक्षकार नहीं बना सकता जिसे इस अदालत के निर्देशों की कोई परवाह न हो।" अदालत ने कहा कि जुर्माना लगाने वाले तीनों आदेश "केवल राज्य सरकार के आचरण और दृष्टिकोण" से संबंधित थे और इनका याचिकाकर्ता के रवैये या मामले में उसकी रुचि से कोई लेना-देना नहीं था। अदालत ने आगे कहा, "विवाद का कोई पक्ष दूसरे पक्ष की कमजोरियों का फायदा नहीं उठा सकता, बल्कि उसे अपने मामले को उसके गुण-दोष और मजबूती के आधार पर लड़ना होता है।"
जस्टिस मौदगिल ने कहा: "मौजूदा मामले में, राज्य ने जानबूझकर ऐसा नहीं किया है, और पंजाब के अतिरिक्त महाधिवक्ता राजीव वर्मा के पास इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि 24 वर्षों से अधिक समय से याचिका के जवाब में राज्य द्वारा लिखित बयान क्यों दाखिल नहीं किया गया है।" अब इस मामले की सुनवाई 12 अक्टूबर तक टाल दी गई है। पिछली सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा था कि यह रिट याचिका 2001 में दायर की गई थी और 27 नवंबर, 2001 के आदेश से इसे टाल दिया गया था। जस्टिस मौदगिल ने कहा था, "नोटिस मिलने के बावजूद, राज्य सरकार पिछले 25 सालों से अपना लिखित जवाब दाखिल करने में नाकाम रही है। ऐसा रवैया न सिर्फ निंदनीय है, बल्कि बेहद चिंताजनक भी है।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि वह राज्य सरकार के "लापरवाह और उदासीन रवैये" पर अपनी नाराजगी जाहिर किए बिना नहीं रह सकता, जिसकी वजह से ऐसी रिट याचिकाएं लंबे समय से लंबित हैं। जस्टिस मौदगिल ने आगे कहा, "इस याचिका में पेंशन से जुड़े लाभों की दोबारा गणना और उन्हें बढ़ाने की सीमित मांग की गई है। इन कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान, इसी तरह की स्थिति वाले कई याचिकाकर्ता नौकरी से रिटायर हो चुके हैं, जबकि कुछ दुर्भाग्य से अपने जायज दावों पर फैसला हुए बिना ही गुजर गए हैं।"
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